सरकार ने गरीबी की नई परिभाषा तय की है। योजना आयोग की माने तो देश के शहरी इलाकों में खाने पर 32 रुपये व ग्रामीण इलाकों में 26 रुपये रोज खर्च करने वाला व्यक्ति गरीब नहीं कहलाएगा। भले इतनी राशि में एक वक्त का खाना न आता हो लेकिन योजना आयोग की नजर में इतने रुपये गरीबी दूर करने के लिए काफी हैं। आयोग ने यह बताने की कोशिश की है कि शहरों हरेक महीने 965 रुपये और गांवों में 781 रुपये खर्च करने वाला व्यक्ति सरकार की नजर में गरीब नहीं है। प्रधानमंत्री के दस्तखत वाले योजना आयोग के इस हलफनामे पर सर्वोच्च न्यायालय 11 अक्टूबर को विचार करेगा। इस अजीबोगरीब आंकड़े को पेश करके योजना आयोग यह बताने की फिराक में है कि इस तरह के लोग बीपीएल कार्ड के दायरे में आने के हकदार नहीं हैं। दरअसल, गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले लोगों को जनकल्याणकारी योजनाओं का लाभ मिलता है। वर्तमान में 12 योजनाएं ऐसी हैं, जो बीपीएल को ध्यान में रखकर संचालित की जा रही हैं जबकि नौ कार्यक्रम उनके हितों की रक्षा के लिए संचालित हो रहे हैं। योजना आयोग गरीबी की नई परिभाषा देते समय यह भूल गया कि वि बैंक भी रोजाना एक डॉलर से कम खर्च करने वाले व्यक्ति को गरीबी रेखा से नीचे मानता है। फिर योजना आयोग का यह नया फामरूला कहां तक तर्कसंगत है? आयोग के इस हलफनामे पर पूरे देश में रोष है। विपक्ष ने भी सरकार पर हमला बोल दिया है तो कुछ मंत्री ने इस नये फामरूले पर आपत्ति जताई है। सरकार से बस एक ही सवाल है कि महंगाई के दौर में 26 रुपये में क्या मिलेगा? आज तो 1 किलो टोंड दूध का भी दाम बाजार में 27 रुपये है। इस राशि से 2 लीटर बोतल बंद पानी भी नहीं मिलता है। उसके लिए भी 30 रुपये चाहिए। आयोग ने गरीबी रेखा पर नया क्राइटीरिया सुझाते हुए कहा है कि गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले एक ग्रामीण को 26 रुपये और शहरी गरीब को 32 रुपये में 1776 कैलोरी मिल सकती है। आयोग की दलील है कि वि स्वास्थ्य संगठन ने भी एक व्यक्ति के लिए 1776 कैलोरी ही पर्याप्त मानी है। आयोग का कहना है कि दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु और चेन्नई में चार सदस्यों वाला परिवार यदि महीने में 3866 रुपये खर्च करता है तो वह गरीब नहीं कहा जा सकता। आयोग ने गरीबी की यह नई परिभाषा 2010-11 के इंडस्ट्रियल वर्कर्स के उपभोक्ता मूल्य सूचकांक और तेंदुलकर कमेटी की रिपार्ट के आधार पर तैयार की गई है। हालांकि हलफनामे के अंत में कहा गया है कि गरीबी रेखा पर अंतिम रिपोर्ट एनएसएसओ सव्रेक्षण 2011-12 के बाद पेश की जाएगी। इसमें हास्यास्पद यह है कि शहरी और ग्रामीण गरीबी का यह निर्धारण 2004-05 की कीमतों के आधार पर किया गया है, जबकि आज कीमतें तब के मुकाबले लगभग दोगुनी-तिगुनी हो गई है। सरकारी बाबुओं की तनख्वाहों और भत्तों में कई बार बढ़ोतरी हुई है, संगठित और निजी क्षेत्र की भी आय में इजाफा होता गया है। सांसदों और विधायकों के वेतन-भत्ते कई गुने बढ़े हैं लेकिन गरीबों की बेहतरी के बारे में सोचने के बजाए आंकड़ों में उनकी संख्या जहां तक हो सके घटा कर दिखाने की कोशिश हो रही है। दरअसल, योजना द्वारा बनाई गई गरीबी मापने की यह कसौटी देश के गरीबों के साथ शर्मनाक मजाक है। यही वजह है कि श्रीमती सोनिया गांधी की एनएसी के सदस्य इस कसौटी को लेकर आग बबूला है। एनएसजी सदस्यों का आरोप है कि योजना आयोग वास्तविकता से दूर सोच रहा है। आज की महंगाई में 32 रुपये में आता ही क्या है? यदि 32 रुपए को आधार बनाया गया तो मुट्ठी भर लोग ही बीपीएल की श्रेणी में आएंगे। समाज का बड़ा गरीब तबका लाभ लेने से वंचित रह जायेगा। राष्ट्रीय सलाहकार परिषद की सदस्य अरुणा राय ने योजना आयोग की आलोचना करते हुए कहा कि सरकार इस आकलन से गरीबी रेखा के नीचे रहने वालों की संख्या अवास्ताविक रूप से कम करना चाहती है ताकि गरीबों पर सरकारी खर्च कम किया जा सके। आखिर हमारे योजनाकार गरीबी की असली तस्वीर पर पर्दा क्यों डालना चाहते हैं? इसलिए कि वे ऐसा करके मौजूदा आर्थिक नीतियों की सार्थकता साबित करना और सरकार पर सब्सिडी का बोझ घटना चाहते हैं। वित्त मंत्रालय भी मानता है कि 35 करोड़ से ज्यादा लोगों को 2 रुपये प्रति किलो की दर से गेहूं और 3 रुपये प्रति किलो की दर से चावल दिया गया तो सरकार की मुश्किलें बढ़ जाएंगी। इसलिए गरीबों की संख्या सीमित करने की कोशिश हो रही है ताकि सरकार पर अधिक बोझ न पड़े। आजादी के छह दशक से यह बहस का विषय बना हुआ है कि गरीबी की परिभाषा क्या है? गरीबों की वास्तविक संख्या कुल कितनी है? बहरहाल, आज देश के सामने गरीबी के कई आंकड़े हैं, जिसे लेकर केंद्र हमेशा से भ्रम की स्थितियां पैदा करता रहा है। गरीबी मापने की जो सरकारी पद्धति है, उसे तमाम अर्थशास्त्री नकारते रहे हैं। दरअसल, सरकार में बैठे योजनाकारों ने गरीबी मापने का जो पैमाना तय किया है, वह गरीबी को छिपाने का काम करता है। इसलिए ही गरीबी की परिभाषा पर योजना आयोग और एनएसी के बीच मतभेद बना रहा है। 2004- 05 में योजना आयोग ने बताया था कि देश में 27.5 फीसद लोग गरीब हैं। 2009 में सुरेश तेंदुलकर समिति ने इसे खारिज करते हुए बताया कि 37 फीसद भारतीय गरीब हैं। उसी दौरान, अजरुन सेनगुप्त समिति ने अपनी रिपोर्ट में कुल आबादी के 77 फीसद हिस्से के गरीबी होने का अनुमान पेश किया था जबकि एन.सी सक्सेना की अध्यक्षता वाली समिति ने आधी यानी 50 फीसद आबादी को गरीब माना। अब योजना आयोग ने गरीबी की जो परिभाषा दी है, वह सचमुच हैरान करने वाली है। बेशक, आज अंतराष्ट्रीय स्तर पर भारत का रुतबा है। इस साल अमेरिका की नेशनल इंटेलिजेंस कौंसिल (एनआईसी) और यूरोपीय संघ की संस्था ईयूआईएसएस ने कहा है कि भारत अमेरिका और चीन के बाद वि का सबसे शक्तिशाली राष्ट्र है लेकिन दुनिया के सबसे भूखे और कुपोषणग्रस्त लोग भारत में ही रहते हैं। अत्यधिक भुखमरी के शिकार हर पांचवां व्यक्ति भारतीय है। वही अंतराष्ट्रीय खाद्य नीति शोध संस्थान द्वारा जारी वैिक भुखमरी सूचकांक में भूख से लड़ रहे 84 देशों की सूची में चीन व पाकिस्तान से भी नीचे भारत का 67वां स्थान है। चीन नौंवे और पाकिस्तान 52वें स्थान पर है। इतना ही नहीं, भारत को कुपोषण और भरण-पोषण के मामले में महिलाओं की खराब स्थिति के चलते ही काफी नीचे स्थान मिला है। ऐसे में योजना आयोग की गरीबी की यह नई परिभाषा समझ से परे है। इसलिए सरकार और योजना आयोग को कृत्रिम आंकड़े गढ़ने के बजाए हकीकत स्वीकार करनी चाहिए। गरीबी की इस अजीबोगरीब परिभाषा का असली मकसद मौजूदा आर्थिक नीतियों की सार्थकता साबित करना और बीपीएल योजनाओं में सरकारी खर्च घटाना है। इसलिए गरीबों की संख्या सीमित करने की कोशिश हो रही है। वित्त मंत्रालय मानता है कि 35 करोड़ से ज्यादा लोगों को 2 रुपये किलो गेहूं और 3 रुपये किलो चावल देने से सरकार की मुश्किलें बढ़ जाएंगी
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