Saturday, December 18, 2010

लोकतंत्र की लीक

भारत से अमेरिका तक लीक की महिमा फैली हुई है। वाटरगेट के टेपों से पता चला था कि चुनाव में अपनी उम्मीदवारी को मजबूत और विरोधी दल की उम्मीदवारी को कमजोर करने के लिए क्या-क्या करामात की जा सकती है। जब ये रहस्योद्घाटन हुए, तब अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति निक्सन ने कहा था, मैं घपलेबाज नहीं हूं। हालांकि लीक हुए कागजों ने साबित किया कि उन्होंने घपलेबाजी की थी। वह थे तो निर्लज्ज ही पर हमारे नेताओं जितना नहीं इसलिए आखिर में उन्होंने इस्तीफा दे ही दिया। हमारे एक नेता ने कहा था कि मैं जान दे दूंगा पर इस्तीफा नहीं दूंगा। जनतंत्र नैतिकता की लीक पर चलने का नाम है। इस लीक से हटकर कोई भी लोकतंत्र नहीं चल सकता। इसकी कोशिश की जाएगी तो लीक पर लीक होंगे। जिस देश में जितने ज्यादा लीक होते हैं, वहां का लोकतंत्र उतना ही स्वस्थ होता चलता है। क्या यह खेद की बात नहीं है कि अमेरिका में दूसरा वाटरगेट नहीं हुआ? क्या चुनाव प्रक्रिया को भ्रष्ट करने में निक्सन को कोई खास महारत हासिल थी और उनके बाद के दूसरे उम्मीदवार पाक-साफ रहे? अगर ऐसा लगता है तो इसका मतलब है कि निक्सन के उत्तराधिकारी अपने-अपने वाटरगेट से बचे रहे। अब तो ऐसा लगता है कि हर नेता और हर मंत्री के साथ कम से कम एक वाटरगेट होना ही चाहिए। सच बाहर आने के लिए कसमसाता रहता है। बस उसे सेंधमार चाहिए जो उसे गोपनीयता के कंटीले तारों से मुक्त कर सके। भारत सरकार बहुत उदार और सहिष्णु है। नीरा राडिया के सनसनीखेज टेप सामने आए तो वह न शरमाई न घबराई। नरसिंह राव और मनमोहन सिंह में यह एक बड़ी समानता है। राव भी किसी रहस्योद्घाटन से न शरमाते थे न घबराते थे। उनका मौन बड़ी से बड़ी घटना से भी नहीं टूटता था। मनमोहन सिंह ने भी वैसी ही स्थितिप्रज्ञता साधी हुई है। उन्हें इस बात पर भी गुस्सा नहीं आया कि नाडिया की बातचीत वाले टेप लीक कैसे हुए? हर स्त्री-पुरुष की तरह हर सरकार भी अपनी गोपनीयता को बचाए रखना चाहती है। यह गोपनीयता भंग होती है तो वह दुर्वासा की तरह क्रुद्ध हो उठती है, लेकिन भारत सरकार खामोश रही। अंत में, उद्योगपति रतन टाटा को अदालत में पेश होकर यह दरख्वास्त करनी पड़ी कि इस लीक कांड की जांच की जाए। सरकार को अपनी इज्जत की परवाह नहीं है, लेकिन रतन टाटा को अपनी इज्जत की फिक्र है। मजेदार बात यह है कि उन्होंने इन टेपों की प्रामाणिकता को चुनौती नहीं दी है। कुछ पत्रकारों ने जरूर कहा है कि उनकी बातचीत को संदर्भ से काट कर पेश किया गया है, लेकिन इन्होंने भी अपने शब्दों को झुठलाया नहीं है। वह सिर्फ यह निवेदन कर रहे हैं कि इन शब्दों का अर्थ वह नहीं है जो और लोग समझ रहे हैं। ऐसे लगता है कि जिनकी बातचीत टेप हो जाती है, उनके लिए एक अलग शब्दकोश बनाना होगा। संयुक्त राज्य अमेरिका की सरकार दुनिया भर में अनोखी है। उसे शर्म नहीं आती, सिर्फ गुस्सा आता है। टेपों से जो सूचनाएं सामने आई हैं उनकी प्रामाणिकता के बारे में एक क्षण के लिए फिर भी संदेह हो सकता है, पर विकिलीक्स ने अपने वेबसाइट पर जो दस्तावेज लीक किए हैं, उनकी सत्यता के बारे में किसी को शक नहीं है। क्या इसीलिए अमेरिकी सरकार बौखलाई हुई है और किसी भी कीमत पर अपने तथाकथित लोकतंत्र की कीमत पर भी विकीलीक्स के संचालक जूलियन असांगे को जेल में देखना चाहती है? यह उसका दबंगपन है। वैसा ही दबंगपन, जैसा उसने पहले वियतनाम में दिखलाया था बाद में इराक और इफगानिस्तान में। मुन्ना बदनाम हो चुका है पर वह इस बदनामी को धोने के लिए यह प्रतिज्ञा तक नहीं करना चाहता कि अब मैं शरीफों की तरह आचरण करुंगा। भारत सरकार खुद को शरीफ नहीं मानती। वह जानती है कि उसके मंत्री भ्रष्ट हैं, उसके नौकरशाह बेईमान हैं। दरअसल, इन्हीं के बल पर हमारी सरकारें चल रही हैं, सभी राजनीतिक दल चल रहे हैं लगभग पूरा उच्च और उच्च-मध्य वर्ग चल रहा है। इसलिए जब भी भ्रष्टाचार का कोई मामला सामने आता है तो जनता के सिवाय कोई भी विचलित नहीं होता। जिस औरत के साथ रोज दो-चार बलात्कार होते हैं वह किसी भी नए बलात्कार से विचलित होना छोड़ देती है। यह नहीं कह सकते कि वह बलात्कार की आदी हो चुकी है। सच यह है कि वह पूरी तरह निराश हो चुकी है। जब उसके रखवाले ही बलात्कारी हों, तब वह किससे फरियाद करे? भारत में टाटा और उनको छोड़ कर जिनकी प्रतिष्ठा धूमिल हुई है, राडिया से बातचीत लीक हो जाने से किसी को अप्रन्नता नहीं है। सब ताली बजा रहे हैं। पर अमेरिका में अनेक महानुभाव चिंतित हैं कि सरकार के गोपनीय दस्तावेज लीक होते रहें तो शासन कैसे चलेगा? खुशी की बात यह है कि पूरा अमेरिका इससे सहमत नहीं है। यह वही वर्ग है जो अमेरिकी सरकार की लोकतंत्र-विरोधी गतिविधियों से आहत है और अपने समाज को निरोग देखना चाहता है। हम सभी को इनसे सहमत होना चाहिए। यह समझना कठिन है कि लोकतांत्रिक सरकारों को इतनी गोपनीयता की जरूरत क्यों पड़ती है। सुरक्षा मामलों को छोड़कर कोई ऐसा काम नहीं होना चाहिए जिसके बारे में जनता को बताया नहीं जा सके। अगर आप लीक पर चलेंगे, तो ऐसा कुछ होगा ही नहीं जिसके लीक हो जाने का डर हो।
 

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