इसमें कोई दो राय नहीं कि काले धन को लेकर हम लोग कुछ ज्यादा ही संवेदनशील हैं। शायद यह निर्धन समाजों की अपनी ग्रंथि होती है कि वह आमतौर पर धन से चिढ़ते हैं। हमारे यहां जब भी ईमानदारी की बात होती है, सच्चाई की बात होती है तो लोग कुछ ज्यादा ही संवेदनशीलता दिखाने की कोशिश करते हैं, जबकि हद यह है कि हम दुनिया के सर्वाधिक, भ्रष्ट, गैर-ईमानदार और बेहद संवेदनहीन समाज हैं। लेकिन काले धन को लेकर हम संवेदनशील हैं। पिछले तीन सालों से देश में बना काले धन के विरुद्ध माहौल भी इसकी वजह है। बाबा रामदेव, अन्ना हजारे जैसे आंदोलनकारियों ने पूरे देश को काले धन के संबंध में इतना जागरूक तो बनाया ही है कि जिनके पास ठोस, वास्तविक जानकारियां नहीं होती हैं, वह भी इस मुद्दे पर तमाम तरह की कल्पनाएं कर लेता है। जाहिर है, जब वित्तमंत्री ने 21 मई को काले धन पर श्वेत पत्र जारी किया तो देश को उम्मीद थी कि वह धमाका करेंगे। देश को बताएंगे कि भारतीयों का कुल कितना धन काले धन के रूप में विदेशों में जमा है और ऐसे काले धन के स्वामी कौन हैं? लोगों को यह भी उम्मीद थी कि शायद वित्तमंत्री काले धन को विदेश से वापस लाने की ठोस तरकीब बताएंगे। किस देश से क्या बातचीत हुई है, क्या समझौता होना है, यह भी बताएंगे और आश्वस्त करेंगे कि कब तक देश में यह काला धन वापस आ पाएगा। लेकिन दुर्भाग्य से ऐसा कुछ नहीं हुआ। वित्तमंत्री के पास बताने के लिए कुछ भी नहीं था। उन्होंने वाकई कुछ बताया भी नहीं। 97 पेज का दस्तावेज जरूर उन्होंने पेश किया, लेकिन सच बात तो यह है कि इस दस्तावेज में कुछ भी ऐसा नहीं है, जिसे सुनकर या जानकर लोग चौकें या महसूस करें कि उनकी जानकारी में यह नया इजाफा हुआ है। सच्चाई तो यह है कि वित्तमंत्री ने एक तरह से काले धन को सफेद लिबास पहना दिया है। आप इस श्वेत पत्र के जरिये इसमें झांक नहीं सकते कि यह कितना है और कैसा है? वित्तमंत्री ने उल्टे लोगों की जानकारियों को ही हतोत्साहित करने की कोशिश की है। एक तरफ वित्तमंत्री को यह पता नहीं है कि देश का काला धन विदेश में जमा है। दूसरी तरफ वह यह बता रहे हैं कि पिछले पांच सालों में लगातार यह धन कम हो रहा है। श्वेत पत्र के मुताबिक 2010 में कोई 9,295 करोड़ रुपये विदेशों में होने का अनुमान है, जबकि 2006 में यह तकरीबन 23,373 करोड़ रुपये था। मजेदार सरकार है, जिसे यह तो पता नहीं है कि हमारा कुल कितना धन विदेशों में जमा है, लेकिन यह पता है कि वह कम हो रहा है। वित्तमंत्री के पास कोई अनुमान भी नहीं है कि आखिर कितना धन हो सकता है। हां, वह यह जरूर बता रहे हैं कि सरकार प्रतिबद्धता के साथ विदेशों से काला धन लाने का प्रयास कर रही है। सवाल है कि क्या ऐसी खानापूर्ति को भी श्वेत पत्र कहा जा सकता है या कहा जाना चाहिए? वाकई श्वेत पत्र एक किस्म से उन करोड़ों भारतीयों के साथ मजाक है, जो पूरी गंभीरता और जीवंतता के साथ पिछले कई सालों से काले धन के खिलाफ मोर्चा खोले हुए हैं। वैसे जो विभिन्न वैश्विक एजेंसियों और अध्ययनों का निष्कर्ष है, उसके मुताबिक विदेशों में जमा भारतीयों का अवैध धन, जिसे हम काला धन कह सकते हैं, वह इतनी बड़ी रकम है कि भारत के सकल घरेलू उत्पाद के करीब आधी बैठती है। काला धन सिर्फ इस मायने में ही खतरनाक नहीं होता कि वह देश के मेहनतकशों द्वारा कमाया जाता है और किसी तरह चालबाजों के हाथ में पहुंचकर विदेश पहुंच जाता है और फिर विदेशों में स्थित उनके अकाउंट को हर गुजरते दिन के साथ बड़ा बनाता रहता है। काला धन सिर्फ अपनी तादाद ही नहीं बढ़ाता, बल्कि वह एक काली अर्थव्यवस्था को भी जन्म देता है, जिसमें नशीली दवाओं का अवैध कारोबार और आतंकवाद जैसी समाज विरोधी गतिविधियां फलती-फूलती हैं। काला धन जिस काली अर्थव्यवस्था को जन्म देता है, उसके चलते वैध अर्थव्यवस्था कमजोर होती है। उदाहरण के लिए फास्ट मूविंग कंज्यूमर गुड्स इंडस्ट्री का सालाना टर्नओवर 1 लाख करोड़ रुपये का है, जिसे काली अर्थव्यवस्था के चलते 7,000 करोड़ रुपये का नुकसान उठाना पड़ता है और अगर इसके दूसरे क्रियाकलापों से होने वाले नुकसानों को भी इसमें जोड़ लें तो तकरीबन 8,000 करोड़ रुपये का सालाना घाटा बैठता है, लेकिन जिस तरह काले धन को लेकर मौजूदा सरकार ने अपने श्वेत पत्र में लीपापोती की है, उससे न तो यह साफ हुआ है कि सरकार की काले धन को खत्म करने के लिए वास्तव में मंशा क्या है और न ही देश को इसकी सच्चाई के बारे में ही पता चला है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
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