Saturday, July 9, 2011

जनता के प्रतिनिधि नहीं हैं सिविल सोसायटी के पंच प्यारे

जहां तक लोकपाल विधेयक की बात है तो चाहे सरकारी लोकपाल बिल हो या फिर सिविल सोसायटी का जन लोकपाल बिल, इतना तो निश्चित है कि हमारे देश में कानून सिर्फ और सिर्फ संसद ही बना सकती है। फिलहाल, सिविल सोसायटी को देश के मतदाताओं ने अपनी मनमानी करने का कोई जनादेश नहीं 

दिया है..कपाल बिल और जनलोकपाल बिल पर भले ही टीम अन्ना हजारे वाया इलेक्ट्रॉनिक मीडिया बनाम यूपीए-2 सरकार के बीच वाक्युद्ध जारी है, मगर आम आदमी पूछ रहा है कि देश की 121 करोड़ जनता के प्रतिनिधित्व का अधिकार सिविल सोसायटी के पांच सदस्यों को किसने सौंप दिया है। भ्रष्टाचार का मुद्दा महत्वपूर्ण है, लेकिन जिस सतही तरीकेसे इसे दुरुस्त करने का सब्जबाग टीम अन्ना द्वारा इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के जरिए दिखाया जा रहा है, वह उसी तरह फेल होनेवाला है, जैसे गरीबी हटाओका नारा। मार्क्‍सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के पोलित ब्यूरो सदस्य व राज्यसभा सदस्य सीताराम येचुरी ने सवाल उठाया है कि अन्ना हजारे नीत सिविल सोसायटी कैसे यह दावा कर सकती है कि वह समूचे समाज यानी पूरे देश का प्रतिनिधित्व करती है, क्योंकि तब यह सवाल उठेगा कि हम क्या अनसिविल सोसायटी के हैं। येचुरी का कहना है कि कथित सिविल सोसायटी के कुछ नेताओं की इस तरह की घोर आपत्तिजनक टिप्पणियां भी अब कभी-कभी सुनने को मिल जाती हैं कि विधायकों और सांसदों को ही लाखों भारतीयों का प्रतिनिधित्व करने का क्या हक है? यह हमारी संसदीय जनतांत्रिक व्यवस्था के प्रति हिमाकत का प्रदर्शन करना ही नहीं है, बल्कि वास्तव में उसे कमजोर करने की कोशिश करना भी है। हमारी संवैधानिक व्यवस्था में जनता की संप्रभुता का व्यवहार राज्य विधायिकाओं और संसद में इसकेचुने हुए प्रतिनिधियों के माध्यम से होता है। कार्यपालिका यानी सरकार विधायिका के प्रति और उसके माध्यम से जनता के प्रति जवाबदेह भी है और उसकी इच्छा पर आश्रित भी। निर्वाचित प्रतिनिधियों के जनता का प्रतिनिधित्व करने के अधिकार पर ही सवाल खड़े करके तथाकथित सिविल सोसायटी के प्रतिनिधि इस समूची संवैधानिक व्यवस्था को ही कमजोर करते नजर आते हैं। आखिर आम मतदाताओं ने ही 1977 में अपने चुनावी फैसले से भारतीय जनतंत्र के तानाशाहीपूर्ण विचलन को शिकस्त दी थी। इन्हीं आम मतदाताओं ने 2004 में सांप्रदायिक ताकतों को हराया था, ताकि गणतंत्र के बुनियादी धर्म निरपेक्ष जनतांत्रिक आधारों की रक्षा हो सके। इन आम मतदाताओं ने ही ऐसे हालात सुनिश्चित किए हैं, जहां सिविल सोसायटी के कथित नेता निश्चिंतता से अपने मोमबत्ती जुलूसोंसे लेकर अनशनतक आयोजित कर सकते हैं।

गुजरात में भ्रष्टाचार के विरुद्ध शुरू हुए आंदोलन की बागडोर जब लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने संभाली और उसे पूरे देश में फैला दिया तो उन्होंने भी नए लोग खड़े करने केबजाय विपक्षी दलों के लोगों व उनके छात्र संगठनों पर ही भरोसा किया था। आपातकाल लगा और अगले चुनाव में कांग्रेस का सफाया हो गया, मगर जो लोग जेपी आंदोलन की डोर पकड़कर सत्ता में आए थे, उनमें से अधिकतर आज भी कांग्रेस या विपक्षी दलों में हैं। मगर न तो नई क्रांति हुई, न भ्रष्टाचार खत्म हुआ, उलटे भ्रष्टाचार व कदाचार ने अपने पैर और मजबूती से जमा लिए। तब के जेपी आंदोलन में शामिल कई लोगों के विरुद्ध आज आय से अधिक संपत्ति का मामला न्यायालयों में चल रहा है। 

पूर्व लोकसभा अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी सिविल सोसायटी के वर्तमान रवैए से आहत हैं। उन्होंने सिविल सोसायटी पर सवाल उठाते हुए कहा कि आखिर ये किन लोगों का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं? इन्हें कौन समर्थन दे रहा है? देश की आबादी 120 करोड़ है। क्या ये सभी का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं? यदि ऐसा है तो फिर जो लोग जनता के बीच से चुनकर आए हैं, वे क्या करेंगे? यह संवैधानिक व्यवस्था को अस्थिर करने की साजिश है, जिसे ठीक नहीं कहा जा सकता। मैं यह नहीं कहता कि लोकपाल न बने, लेकिन यह कानून के माध्यम से ही संभव है। अगर दो पक्षों के बीच सहमति बन जाए और संसद में प्रस्ताव गिर जाए, फिर ये सिविल सोसायटी वाले अनशन पर बैठेंगे, लेकिन उससे होगा क्या? ऐसे देश नहीं चलता है। व्यवस्था में बदलाव एक सतत् प्रक्रिया है। सिविल सोसायटी और राजनीतिक दलों को मालूम होना चाहिए कि लोग अब जागरूक हो गए हैं। आनेवाली पीढ़ी भ्रष्ट नेताओं को बर्दाश्त नहीं करेगी और उन्हें कुर्सी से हटा देगी। सोमनाथ चटर्जी ने फिर कहा कि न्यायपालिका को कार्यपालिका में दखल देने का कोई हक नहीं है। संसद सर्वोपरि है और यही लोकतांत्रिक व्यवस्था भी है। 

कचहरी, स्थानीय निकाय, प्रशासन, पुलिस, कस्टम-एक्साइज, आबकारी, लोक निर्माण, सिंचाई, व्यापार कर आदि सरकारी विभागों में व्याप्त कदम-कदम पर भ्रष्टाचार तो जगजाहिर है, मगर टीम अन्ना को यह भी जानना चाहिए कि आज अच्छे विालयों, इंजीनियरिंग, मैनेजमेंट व मेडिकल कालेजों में प्रवेश में कैपीटेशन फीस से लेकर न्यायपालिका में तारीख लेने तक में भारी भ्रष्टाचार व्याप्त है। आलम यह है कि कतिपय बड़े वकीलों को छोड़कर मुकदमा लेकर आनेवाले जिलों व तहसीलों के वकीलों को 40 प्रतिशत कमीशन व नर्सिग होमों में मरीज ले आनेवाले झोलाछाप डाक्टरों को 30-40 प्रतिशत कमीशन, दिल्ली या महानगरों के बड़े-बड़े डाक्टरों के नाम पर चलने वाले हार्ट क्लीनिकों में मरीज रिफर करने वाले जिलों के डाक्टरों को 40 प्रतिशत कमीशन का भुगतान होता है, जो पूरी तरह कालाधन ही है। दरअसल, हमारे समाज के रग-रग में भ्रष्टाचार व्याप्त हो गया है। 

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