इस ड्राफ्ट के मुताबिक केवल पूर्व सीईसी और पूर्व सीएजी ही इस देश की सवा अरब आबादी में इस लायक समझे गए हैं जो ईमानदारी के पुतले होते हैं। सर्च कमेटी के बाकी पांच सदस्यों में भी देश के आम नागरिकों की कोई भूमिका नहीं होगी। केवल सम्मानित लोगों की ही भूमिका होगी। यानी लोकतंत्र की मूल भावना जनता का शासन, जनता के द्वारा, जनता के लिए बेमानी हो जाएगी..स बार आजादी की सालगिरह कुछ अलग किस्म की होने की उम्मीद है। कारण है कि महात्मा गांधी के 21वीं सदी के अवतार अन्ना हजारे ऐलान कर चुके हैं कि अगर 15 अगस्त तक जनलोकपाल विधेयक पारित न किया गया तो वे 16 अगस्त से फिर आमरण अनशन करेंगे। अभी तक के सूरत-ए-हाल संकेत दे रहे हैं कि अन्ना को भूखे रहने के लिए तैयार रहना चाहिए क्योंकि न तो सरकार और सिविल सोसाइटी के सदस्यों में इस बिल को लेकर सहमति बनी है और न ही किसी राजनीतिक दल ने संसद में अपने रुख पर अपने पत्ते खोले हैं। दूसरा, अगर इस माह किसी प्रारूप पर सबकी सहमति मिल भी गई तो संसद का मॉनसून सत्र एक अगस्त से शुरू होगा और 15 अगस्त से पहले तो यह किसी भी हालत में पारित होने से रहा। सो, अन्ना जी का अनशन तो पक्का है।
यहां सवाल यह है कि क्या लोकपाल बहुत जरूरी है और वह भी उसी शक्ल में जैसा कि अन्ना मंडली चाहती है? जाहिर सी बात है कि इस प्रश्न पर देश भर में गंभीर मतभेद हैं। पहला सवाल तो यही है कि अन्ना मंडली को देश के किस वर्ग का समर्थन हासिल है? क्या अन्ना मंडली देश के संविधान और सवा अरब की आबादी से ऊपर कोई दैवी शक्ति है? अभी तक जो इस मंडली की हरकतें सामने आई हैं उससे तो यही लगता है कि यह मंडली देश के संविधान से ऊपर की कोई चीज है। देश को लोकपाल मिले या न मिले, भ्रष्टाचार मिटे या न मिटे लेकिन अगर यह मंडली अपने मकसद में कामयाब हो गई तो देश का लोकतंत्र हार जाएगा। हमारे संविधान में संसद सवरेपरि है और कोई भी कानून बनाने या निरस्त करने का अधिकार उसी के हाथों केंद्रित है। यह पहली बार हो रहा है कि बाहरी असामाजिक तत्व, जो स्वयं को इस देश का आम नागरिक नहीं मान रहे, वे खुद को सिविल सोसाइटी कह रहे हैं, सरकार के साथ मिलकर कोई कानून बनाने जा रहे हैं। अगर यह परिपाटी पड़ गई तो लोकतंत्र समाप्त हो जाएगा और दस हजार सफेदपोश संसद के बाहर मजमा लगाकर जब चाहेंगे तभी अपनी सुविधा के मुताबिक कोई नया कानून बना लेंगे। यह सभी राजनीतिक दलों का कत्र्तव्य बनता है कि उनके आपस के चाहे जो राजनीतिक विवाद हों उनसे ऊपर उठकर इस अलोकतांत्रिक प्रक्रिया को रोकें। जन लोकपाल विधेयक के विरोध में कुछ प्रमुख कारणों पर विचार किया जाना चाहिए। पहला यह कि अन्ना मंडली का लोकपाल किसके प्रति उत्तरदायी होगा? क्या यह संसद, संविधान, विधायिका या जनता के प्रति उत्तरदायी होगा? अभी तक लोकपाल का जो स्वरूप इस मंडली ने पेश किया है उसके मुताबिक यह किसी के प्रति उत्तरदायी नहीं होगा। फिर क्या यह एक निरंकुश व्यवस्था होगी? इसके चयन की प्रक्रिया में आम जनता की कोई भागेदारी नहीं होगी। कुछ तथाकथित सम्मानित और संभ्रांत लोग इस प्रक्रिया में शामिल होंगे। इस मंडली के एक प्रपत्र के अनुसार, जनलोकपाल के दस सदस्यों और अध्यक्ष के चयन के लिए एक चयन समिति बनाई जाएगी। इस समिति में प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता, दो सबसे कम उम्र के हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश, भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक व मुख्य निर्वाचन आयुक्त होंगे। चयन समिति योग्य लोगों का चयन उस सूची से करेगी, जो उसे सर्च कमेटी द्वारा मुहैया कराई जाएगी। अब इस प्रक्रिया पर करीब से गौर किया जाए तो इसमें जनता की भागीदारी कहां नजर आती है? अगर प्रधानमंत्री और लोकसभा में विपक्ष के नेता को जनता की भागीदारी माना जा रहा है तब दो सवाल उठते हैं। इस समिति में जनता की भागीदारी अल्पमत की है और नौकरशाहों का वर्चस्व है क्योंकि चयन समिति के आठ सदस्यों में से मात्र दो जनता द्वारा निर्वाचित हैं। तो पहला सवाल यह कि क्या भारत की जनता बेवकूफ है? ऐसा माना भी जा सकता है क्योंकि अन्ना जी का पक्का विश्वास है कि वोटर सौ रुपए की शराब की बोतल पर बिक जाता है! दूसरा सवाल यह कि अगर प्रधानमंत्री और लोकसभा में विपक्ष के नेता जनता का प्रतिनिधित्व करते हैं तो अन्ना मंडली को जनता के द्वारा चुनी जाने वाली किसी प्रक्रिया पर ऐतराज क्यों है?
इससे भी ज्यादा आपत्ति वाली बात यह ड्राफ्ट आगे कहता है, सर्च कमेटी में दस सदस्य होंगे, जिसका गठन इस तरह होगा - सबसे पहले पूर्व सीईसी और पूर्व सीएजी में से पांच सदस्य चुने जाएंगे। इनमें वे पूर्व सीईसी और पूर्व सीएजी शामिल नहीं होंगे जो दागी हों या किसी राजनीतिक पार्टी से जुड़े हों या अब भी किसी सरकारी सेवा में कार्यरत हों। ये पांच सदस्य बाकी पांच सदस्यों का चयन देश के सम्मानित लोगों में से करेंगे, और इस तरह दस लोगों की सर्च कमेटी बनेगी। यहीं इस मंडली का लोकतंत्र विरोधी चेहरा बेनकाब हो जाता है और इसकी जनविरोधी सोच को समझा जा सकता है। इस ड्राफ्ट के मुताबिक केवल पूर्व सीईसी और पूर्व सीएजी ही इस देश की सवा अरब आबादी में इस लायक समझे गए हैं जो ईमानदारी के पुतले होते हैं। सर्च कमेटी के बाकी पांच सदस्यों में भी देश के आम नागरिकों की कोई भूमिका नहीं होगी। केवल सम्मानित लोगों की ही भूमिका होगी। यानी लोकतंत्र की मूल भावना जनता का शासन, जनता के द्वारा, जनता के लिए बेमानी हो जाएगी। अब जरा इन सम्मनित लोगों की परिभाषा पर भी ध्यान दे लिया जाए। सर्च कमेटी देश के विभिन्न सम्मानित लोगों जैसे संपादकों, कुलपतियों या जिनको वे ठीक समझें, उनसे सुझाव मांगेगी। यानी इस मंडली की नजर में 80 रुपए रोज की दिहाड़ी का मजदूर इस देश का सम्मानित नागरिक नहीं है। सम्मानित संपादक जी हैं, कुलपति हैं या वे जिन्हें यह कमेटी कह दे कि वे सम्मानित हैं।
यहां सवाल यह है कि क्या लोकपाल बहुत जरूरी है और वह भी उसी शक्ल में जैसा कि अन्ना मंडली चाहती है? जाहिर सी बात है कि इस प्रश्न पर देश भर में गंभीर मतभेद हैं। पहला सवाल तो यही है कि अन्ना मंडली को देश के किस वर्ग का समर्थन हासिल है? क्या अन्ना मंडली देश के संविधान और सवा अरब की आबादी से ऊपर कोई दैवी शक्ति है? अभी तक जो इस मंडली की हरकतें सामने आई हैं उससे तो यही लगता है कि यह मंडली देश के संविधान से ऊपर की कोई चीज है। देश को लोकपाल मिले या न मिले, भ्रष्टाचार मिटे या न मिटे लेकिन अगर यह मंडली अपने मकसद में कामयाब हो गई तो देश का लोकतंत्र हार जाएगा। हमारे संविधान में संसद सवरेपरि है और कोई भी कानून बनाने या निरस्त करने का अधिकार उसी के हाथों केंद्रित है। यह पहली बार हो रहा है कि बाहरी असामाजिक तत्व, जो स्वयं को इस देश का आम नागरिक नहीं मान रहे, वे खुद को सिविल सोसाइटी कह रहे हैं, सरकार के साथ मिलकर कोई कानून बनाने जा रहे हैं। अगर यह परिपाटी पड़ गई तो लोकतंत्र समाप्त हो जाएगा और दस हजार सफेदपोश संसद के बाहर मजमा लगाकर जब चाहेंगे तभी अपनी सुविधा के मुताबिक कोई नया कानून बना लेंगे। यह सभी राजनीतिक दलों का कत्र्तव्य बनता है कि उनके आपस के चाहे जो राजनीतिक विवाद हों उनसे ऊपर उठकर इस अलोकतांत्रिक प्रक्रिया को रोकें। जन लोकपाल विधेयक के विरोध में कुछ प्रमुख कारणों पर विचार किया जाना चाहिए। पहला यह कि अन्ना मंडली का लोकपाल किसके प्रति उत्तरदायी होगा? क्या यह संसद, संविधान, विधायिका या जनता के प्रति उत्तरदायी होगा? अभी तक लोकपाल का जो स्वरूप इस मंडली ने पेश किया है उसके मुताबिक यह किसी के प्रति उत्तरदायी नहीं होगा। फिर क्या यह एक निरंकुश व्यवस्था होगी? इसके चयन की प्रक्रिया में आम जनता की कोई भागेदारी नहीं होगी। कुछ तथाकथित सम्मानित और संभ्रांत लोग इस प्रक्रिया में शामिल होंगे। इस मंडली के एक प्रपत्र के अनुसार, जनलोकपाल के दस सदस्यों और अध्यक्ष के चयन के लिए एक चयन समिति बनाई जाएगी। इस समिति में प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता, दो सबसे कम उम्र के हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश, भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक व मुख्य निर्वाचन आयुक्त होंगे। चयन समिति योग्य लोगों का चयन उस सूची से करेगी, जो उसे सर्च कमेटी द्वारा मुहैया कराई जाएगी। अब इस प्रक्रिया पर करीब से गौर किया जाए तो इसमें जनता की भागीदारी कहां नजर आती है? अगर प्रधानमंत्री और लोकसभा में विपक्ष के नेता को जनता की भागीदारी माना जा रहा है तब दो सवाल उठते हैं। इस समिति में जनता की भागीदारी अल्पमत की है और नौकरशाहों का वर्चस्व है क्योंकि चयन समिति के आठ सदस्यों में से मात्र दो जनता द्वारा निर्वाचित हैं। तो पहला सवाल यह कि क्या भारत की जनता बेवकूफ है? ऐसा माना भी जा सकता है क्योंकि अन्ना जी का पक्का विश्वास है कि वोटर सौ रुपए की शराब की बोतल पर बिक जाता है! दूसरा सवाल यह कि अगर प्रधानमंत्री और लोकसभा में विपक्ष के नेता जनता का प्रतिनिधित्व करते हैं तो अन्ना मंडली को जनता के द्वारा चुनी जाने वाली किसी प्रक्रिया पर ऐतराज क्यों है?
इससे भी ज्यादा आपत्ति वाली बात यह ड्राफ्ट आगे कहता है, सर्च कमेटी में दस सदस्य होंगे, जिसका गठन इस तरह होगा - सबसे पहले पूर्व सीईसी और पूर्व सीएजी में से पांच सदस्य चुने जाएंगे। इनमें वे पूर्व सीईसी और पूर्व सीएजी शामिल नहीं होंगे जो दागी हों या किसी राजनीतिक पार्टी से जुड़े हों या अब भी किसी सरकारी सेवा में कार्यरत हों। ये पांच सदस्य बाकी पांच सदस्यों का चयन देश के सम्मानित लोगों में से करेंगे, और इस तरह दस लोगों की सर्च कमेटी बनेगी। यहीं इस मंडली का लोकतंत्र विरोधी चेहरा बेनकाब हो जाता है और इसकी जनविरोधी सोच को समझा जा सकता है। इस ड्राफ्ट के मुताबिक केवल पूर्व सीईसी और पूर्व सीएजी ही इस देश की सवा अरब आबादी में इस लायक समझे गए हैं जो ईमानदारी के पुतले होते हैं। सर्च कमेटी के बाकी पांच सदस्यों में भी देश के आम नागरिकों की कोई भूमिका नहीं होगी। केवल सम्मानित लोगों की ही भूमिका होगी। यानी लोकतंत्र की मूल भावना जनता का शासन, जनता के द्वारा, जनता के लिए बेमानी हो जाएगी। अब जरा इन सम्मनित लोगों की परिभाषा पर भी ध्यान दे लिया जाए। सर्च कमेटी देश के विभिन्न सम्मानित लोगों जैसे संपादकों, कुलपतियों या जिनको वे ठीक समझें, उनसे सुझाव मांगेगी। यानी इस मंडली की नजर में 80 रुपए रोज की दिहाड़ी का मजदूर इस देश का सम्मानित नागरिक नहीं है। सम्मानित संपादक जी हैं, कुलपति हैं या वे जिन्हें यह कमेटी कह दे कि वे सम्मानित हैं।
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