उमेश चतुर्वेदी
पहले गुजरात के स्थानीय निकाय और हाल के बिहार विधानसभा चुनाव के नतीजों ने एक ऐसा संदेश भी दिया है, जिस पर कम ही राजनीतिक विश्लेषकों की निगाह जा रही है। अब तक मुस्लिम वोटरों को ऐसा थोक वोट बैंक माना जाता रहा है, जो बहुसंख्यक वोटों के बरक्स कहीं ज्यादा भरोसेमंद रहा है। उसके बारे में यह भी अवधारणा रही है कि पंथनिरपेक्ष पार्टियों और सांप्रदायिकता के खिलाफ संघर्ष करने वाली पार्टियों के लिए ही मतदान करता रहा है, लेकिन गुजरात और बिहार चुनाव के नतीजे इस अवधारणा को बदलते हुए प्रतीत हो रहे हैं। मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य में भारतीय जनता पार्टी और शिवसेना को ऐसी पार्टी माना जाता रहा है, जिसे मुस्लिम वोटरों का समर्थन नहीं मिल सकता। सांप्रदायिकता के समर्थन और विरोध के आधार पर आगे बढ़ रही मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था में इस तथ्य को अब तक स्वीकार्य माना जाता रहा है, लेकिन बिहार के चुनावों ने अब साबित कर दिया है कि मौजूदा राजनीति शास्त्र के इस सिद्धांत की पड़ताल करने और मुस्लिम मतदाताओं के बदलते नजरिए को नए सिरे से देखने का वक्त आ गया है। हालांकि अब तक के पैमाने के मुताबिक जो पंथनिरपेक्ष ताकतें हैं, उनके लिए इस तथ्य को स्वीकार करना आसान नहीं होगा। कठिनाई तो उस भारतीय जनता पार्टी को भी होगी, जिसके नाम के साथ ही हिंदुत्व और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का विशेषण सदा के लिए चस्पा हो चुका है। राजनीतिशास्ति्रयों की नजर में अल्पसंख्यक समुदाय हमेशा बहुसंख्यक समाज को सशंकित नजरिए से देखता है। लिहाजा लोकतांत्रिक समाज में वह बहुसंख्यक समुदाय की तुलना में एक ऐसे थोक वोट बैंक की तरह व्यवहार करता है, जहां बहुसंख्यकों के बरक्स उसकी जाति-उपजाति और वर्ग का अस्तित्व मायने नहीं रखता। आजादी के पहले से ही भारतीय मुस्लिम समुदाय को इसी नजरिए से देखा जाता रहा है और इसी आधार पर हर चुनाव के ऐन पहले उनके रुझान पर खास ध्यान दिया जाता रहा है। चुनाव विश्लेषक इसी आधार पर भावी वोटिंग रुझानों और उसके नतीजों की गणना करते रहे हैं। राजनीतिक पार्टियों की चुनावी रणनीति बनाने में भी यह भावी रुझान ही आधार बनता रहा है, लेकिन गुजरात के स्थानीय निकाय चुनावों के नतीजों और बिहार चुनाव में भाजपा प्रत्याशियों की भारी जीत ने चुनावी विश्लेषण की अब तक की परिपाटी को बदलने की दिशा में कदम उठा दिया है। अब तक यह माना जाता रहा है कि भारतीय मुसलमान पंथनिरपेक्षता का दावा करने वाली उसी पार्टी को वोट देते हैं, जिन्हें वह भारतीय जनता पार्टी को हराने के काबिल मानते हैं। उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह और बिहार में लालू यादव की हैसियत भाजपा को शिकस्त देने वाले की ही रही है। इस आधार पर अगर लालू यादव एक बार फिर खुद की पार्टी के बहुमत का दावा कर रहे थे तो इसमें उनकी गलती नहीं थी। बिहार में 16.5 फीसदी मुस्लिम वोटर हैं, लेकिन इसी तरह करीब 11 प्रतिशत यादव वोटर हैं। कुल मिलाकर उन्हें इन वोटरों का समर्थन मिलता रहा है। यह वोट बैंक ही तीस प्रतिशत बनता है। फिर लालू प्रसाद यादव की छवि पंथनिरपेक्षता के अलंबरदार की रही है। पिछड़ी जातियों में भी उनका मजबूत आधार माना जाता रहा है। इस आधार पर तो उनकी घोषणा में कोई गलती नहीं मानी जा सकती, लेकिन बिहार चुनाव के नतीजों ने लालू की इस उम्मीद पर तुषारापात किया है। बिहार में चुनाव अभियान शुरू होने से पहले कट्टर छवि वाले बीजेपी नेता नरेंद्र मोदी और वरुण गांधी के प्रचार में शामिल करने पर नीतीश कुमार ने एतराज जताया था। नीतीश कुमार को डर था कि इन दोनों नेताओं के आने से बिहार के मुस्लिम वोटर उनका साथ छोड़ जाएंगे। बीजेपी ने उनका ख्याल रखते हुए मोदी और वरुण को बिहार नहीं भेजा। इस आधार पर नीतीश के ज्यादा मुस्लिम प्रत्याशी जीतने चाहिए थे, लेकिन हुआ ठीक उलटा है। बीजेपी को मिली 91 सीटों में से 30 सीटें मुस्लिम बहुल इलाकों से ही आई हैं, जबकि जेडीयू के सिर्फ 12 विधायक ही मुस्लिम बहुल इलाकों से चुने गए हैं। बहरहाल, इन सभी 42 सीटों में मुस्लिम वोटरों की तादाद कहीं भी 20 फीसदी से कम नहीं है। पूर्णिया के जिस अमौर से बीजेपी के सबा जफर ने बाजी मारी है, वहां मुस्लिम मतदाताओं की तादाद 75 फीसदी है। पूर्णिया के ही बसई में मुस्लिम वोटरों की तादाद करीब 69 फीसदी है। कायदे से यहां से आरजेडी या कांग्रेस का प्रत्याशी जीतना चाहिए था, लेकिन बाजी बीजेपी के संतोष कुमार के हाथ लगी है। इसी तरह कटिहार के प्राणपुर से बीजेपी के विनोद सिंह और कदवा से भोला राय विधायक बने हैं, जहां मुस्लिम मतदाताओं की तादाद 50 फीसदी से ज्यादा है। बीते सितंबर में मुस्लिम वोट बैंक को लेकर बरसों से चली आ रही मान्यता गुजरात में भी ढह गई। आजादी के बाद से ही खेड़ा जिले की यह विधानसभा सीट कांग्रेस का गढ़ मानी जाती रही है। करीब पचास फीसदी मुस्लिम वोटरों वाली इस विधानसभा सीट पर कांग्रेस के अलावा दूसरे किसी दल की जीत की कल्पना ही नहीं की जा सकती थी, बीजेपी के लिए यहां सफलता पाना दूर की कौड़ी ही माना जाता था। मुस्लिम विरोधी और सांप्रदायिकता का राजनीतिक कलंक ढोती रही बीजेपी ने जब सितंबर में इस सीट को 24 हजार के भारी अंतर से जीत लिया तो पहली बार माना जाने लगा कि बीजेपी को लेकर मुसलमानो का नजरिया बदलने लगा है। इस जीत से उत्साहित नरेंद्र मोदी ने यह ऐलान करने में देर नहीं लगाई कि 65 फीसदी मुस्लिम वोटरों के सहयोग के बिना बीजेपी की यह जीत नहीं हो सकती थी, लेकिन राजनीतिक हलकों में इसे सिर्फ उपचुनाव का तात्कालिक उबाल माना गया। हालांकि इसके ठीक एक महीने बाद हुए स्थानीय निकाय चुनावों में बीजेपी ने 24 जिला पंचायतों में से 21 और 208 तालुका पंचायतों में से 162 को भारी बहुमत से जीत लिया। इसी तरह भारतीय जनता पार्टी का 53 नगरपालिकाओं में से 41 पर कब्जा हो गया। इसके पहले अक्टूबर में ही हुए चुनाव में बीजेपी ने अहमदाबाद, बड़ोदरा, राजकोट, सूरत, जामनगर और भावनगर नगर निगमों पर अपना कब्जा बरकरार रखा। इन चुनाव नतीजों से साफ है कि भाजपा को लेकर मुस्लिम वोटरों के मन में रही गांठ टूट रही है। यह गांठ का टूटना ही है कि मुस्लिम वोट बैंक ऐसा थोक वोट बैंक नहीं रहा, जो बहुसंख्यक वोटरों के सांप्रदायिकता की डर में जाति-वर्ग भुलाकर सिर्फ मुस्लिम के तौर पर वोट डालते रहे हैं। बिहार के विधानसभा चुनाव ने इसी अवधारणा को आगे बढ़ाने में मदद दी है। भाजपा और उसके मातृ संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को मुस्लिम विरोधी संगठन ही माना जाता रहा है। उसके सहयोगी संगठनों का आक्रामक रवैया इस अवधारणा को पुष्ट करने का आधार भी मुहैया कराता रहा है। हालांकि केंद्र में 1998 में सरकार बनाने के बाद भाजपा को अपने कट्टर रवैये में बदलाव लाना पड़ा, लेकिन उसकी तमाम उदार कोशिशें भी कम से कम बौद्धिक जगत में बीजेपी को लेकर जारी पारंपरिक अवधारणा को तोड़ने में कामयाब नहीं हो पाई। यही वजह रही कि भाजपा के कट्टर विरोधी लालू यादव, मुलायम सिंह यादव और कांग्रेस मुस्लिम वोटरों के सहज विकल्प माने जाते रहे, लेकिन हाल के इन दो चुनावों ने इस अवधारणा को तोड़ने की दिशा में कदम बढ़ा दिए हैं। अगर यही ट्रेंड चलता रहा तो आने वाले दिनों में कांग्रेस को ही नहीं, भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ तक को अपनी रणनीति बदलनी पड़ सकती है। भाजपा को जहां और ज्यादा उदार चेहरा अख्तियार करना पड़ सकता है तो वहीं कांग्रेस-लालू को मुस्लिम वोटरों पर अपने एकाधिकार को तिलांजलि देनी पड़ सकती है। इससे भारतीय राजनीति और मतदान प्रक्ति्रया में व्यापक बदलाव देखने को मिल सकते हैं। भले ही इसका नुकसान और फायदा दोनों ही तरफ के दलों को उठाना पड़ सकता है। भारतीय लोकतंत्र की सफलता एक ऐसे वोटर के अस्तित्व को स्थापित करना है, जो अपने विवेक के आधार पर अपना वोट दे, जाति-वर्ग और दूसरे तरह के पूर्वाग्रहों को अपने मतदान के दौरान हावी न होने दे। अगर इस दिशा में भारतीय मुसलमान भी बढ़ा तो निश्चित समझिए, सबसे ज्यादा फायदा भारतीय लोकतंत्र का ही होगा।
No comments:
Post a Comment