Saturday, February 18, 2012

निजी हाथों में न सौंपें आईसीडीएस


यह वाकई विचित्र है कि हमारे देश में बाल कुपोषण के अस्वीकार्य रूप से ज्यादा बने रहने पर प्रधानमंत्री का विक्षोभ तभी जागा, जब एक गैर सरकारी संगठन की रिपोर्ट में इस सचाई को रेखांकित किया गया है। इससे पहले भी अनेक रिपोटरे में, जिनमें सरकारी एजेंसियों की रिपोर्टे भी शामिल हैं, इस सचाई को रेखांकित किया गया था कि सकल घरेलू वृद्धि दर के आंकड़े के विपरीत देश के स्वास्थ्य की स्थिति काफी निराशाजनक है। क्या वाकई प्रधानमंत्री को इन सचाइयों की खबर ही नहीं थी?
बाल विकास कार्यक्रम की दशा
देश में नवजात शिशु मृत्यु दर, मातृ मृत्यु दर, बाल कुपोषण, खून की कमी आदि के असहनीय रूप से ऊंचे स्तर पर बने रहने की समस्या से निपटने के लिए सरकार के एक महत्त्वपूर्ण हस्तक्षेप के रूप में, समेकित बाल विकास परियोजना (आईसीडीएस) 1975 में एक तजुब्रे के रूप में की गई थी और इस कार्यक्रम ने अपनी कारगरता साबित की है। लेकिन सरकार समुचित वित्तीय संसाधन आवंटित करने के जरिए इस कार्यक्रम की पूरी संभावनाओं का दोहन करने के लिए जरूरी कदम उठाने में विफल ही रही है। 28 नवम्बर 2001 को सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को निर्देश दिया था कि आईसीडीएस को सार्वभौम बनाया जाए और उसकी सभी सेवाएं, छह वर्ष से कम आयु के सभी बच्चों को तथा सभी गर्भवती महिलाओं व नव-प्रसूताओं को मुहैया कराई जाएं। इसके बावजूद, 2004 तक तो इस मामले में संतोषजनक कुछ भी नहीं किया गया। कथित रूप से सार्वभौम बनाए जाने के बावजूद खुद सरकार के ही रिकाडरे के अनुसार, देश में छ: वर्ष से कम आयु के जो 16 करोड़ बच्चे हैं उनमें से, आधे से भी कम ही आईसीडीएस के दायरे में आते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने इन सेवाओं को सार्वभौम बनाने के लिए आंगनवाड़ियों की संख्या बढ़ाकर 14 लाख करने का आदेश दिया था। इनमें 1,10,000 से ज्यादा आंगनवाड़ी केंद्र तो नाकारा ही बने हुए हैं। दूसरी ओर काम कर रहे माने जाने वाले केंद्रों में से भी 73,000 हजार में कोई आंगनवाड़ीकर्मी ही नियुक्त नहीं किए गए हैं। आंगनवाड़ी सुपरवाइजरों के तो करीब एक-तिहाई पद खाली ही पड़े हुए हैं।
सार्वभौम सिर्फ नाम के वास्ते
इसके अलावा आंगनवाड़ी केंद्रों का फैलाव भी एक जैसा नहीं है। एक ओर तो ऐसे इलाकों में जहां पहले से आंगनवाड़ी केंद्र मौजूद हैं, नये-नये केंद्र खोले जा रहे हैं। दूसरी ओर अनुसूचित जाति/ जनजाति-बहुल इलाकों में दूर-दूर तक कोई आंगनवाड़ी केंद्र ही नहीं हैं। ज्यादातर आंगनवाड़ी केंद्रों के पास अपनी कोई जगह नहीं है और इनमें से अनेक तो अब भी खुली जगहों पर ही चल रहे हैं। सामुदायिक भागीदारी के नाम पर आंगनवाड़ी केंद्रों के लिए भोजन की आपूर्ति, भोजन तैयार करने तथा भोजन के वितरण के कामों का निजीकरण किया जा रहा है। इसका नतीजा यह हो रहा है कि इनके लिए खाद्य की आपूर्ति बहुत बार अनियमित तरीके से होती है और वितरित होने वाला भोजन अक्सर मात्रा में अपर्याप्त व गुणवत्ता में खराब होता है, जिसे बच्चे खाना ही पसंद नहीं करते हैं।
अजीबोगरीब दलील
जिस एनजीओ के अध्ययन ने बाल कुपोषण के सवाल पर प्रधानमंत्री की आत्मा को झकझोर कर जगा दिया है, उसके प्रतिनिधि ने रिपोर्ट जारी किए जाने के मौके पर एक अजीबोगरीब दलील पेश की है। उसने दावा किया कि भारत में बाल कुपोषण की वजह न तो गरीबी है और न भूख। बाल कुपोषण की वजह तो, ‘खाने व खिलाने की आदतों’ में छुपी है! यह तब है जबकि योजना आयोग की मानव विकास रिपोर्ट के अनुसार पूरे 31 करोड़ भारतीय गरीब हैं। सचाई यह है कि नवउदारवादी नीतियों के बोलबाले के पिछले दशकों में, कुल मिलाकर प्रति व्यक्ति कैलोरी व प्रोटीन आहार में गिरावट ही आई है। वि भूख सूचकांक (जीएचआई) में भारत को, इसके तहत आने वाले 84 देशों में से 67 वें स्थान पर रखा गया है। भूख सूचकांक में देशों को, उनकी कुपोषित आबादी के अनुपात, पांच वर्ष की आयु तक के कम वजन के बच्चों के अनुपात तथा पांच वर्ष की आयु तक के शिशुओं की मृत्यु दर के हिसाब से, आंका जाता है। 2008 में भारत के लिए अलग से जो सव्रे किया गया था, उसमें 15 राज्यों को गिनती में लिया गया था, जिनमें भारत की कुल आबादी का 95 फीसद हिस्सा रहता है। इसका मतलब कोई भी राज्य भूख की मार से बरी नहीं है। इस सव्रे के अनुसार, 12 राज्यों में भूख के पहलू से हालात ‘चिंताजनक’ थे और मध्य प्रदेश के मामले में तो ‘अति-चिंताजनक’। ऐसे मामलों में यह और भी जरूरी हो जाता है कि उपयुक्त रोजगार मुहैया कराने के जरिए लोगों को गरीबी की दलदल से बाहर निकाला जाए। पीडीएस को मजबूत कर, सस्ती दरों पर खाद्यान्न मुहैया कराने तथा इसके तहत क्रम में गेहूं-चावल के साथ दालें व खाने-पकाने का तेल आदि भी सस्ती दरों पर दिया जाना चाहिए। इसके साथ, सभी बच्चों, गर्भवती महिलाओं तथा प्रसूताओं को पर्याप्त मात्रा में पोषक आहार मुहैया कराया जाना भी जरूरी है।
आईसीडीएस का निजीकरण नहीं इलाज
बहरहाल, अंत में बिल्ली थैले से बाहर आ ही गई। प्रधानमंत्री ने यह कहकर अपना छुपा हुआ एजेंडा उजागर कर दिया अब हम कुपोषण का मुकाबला करने के लिए सिर्फ आईसीडीएस के ही भरोसे नहीं रह सकते हैं। नवउदारवादी नीतियों के अपनाए जाने के बाद से ही सरकार इसकी कोशिशों में लगी रही है कि आईसीडीएस का निजीकरण किया जाए और किसी तरह से अपने कंधों पर से यह जिम्मेदारी उतार दी जाए। सामुदायिक हिस्सेदारी के नाम पर पूरक आहार की आपूर्ति, उसे तैयार करने तथा उसके वितरण के काम और आंगनवाड़ी केंद्रों के प्रबंधन का काम पंचायतों को, स्वयं सहायता ग्रुपों को, माता कमेटियों को, एनजीओ को (जिनमें उक्त अध्ययन करने वाला नैगम भी शामिल है) और वेदांत जैसे भीमकाय नैगम घरानों को भी सौंपे जा रहे हैं। कई राज्यों में तो आंगनवाड़ी केंद्रों के ऐन बगल में, उन्हीं बच्चों को लक्ष्य बनाकर सरकार के विभिन्न विभागों द्वारा अस्थायी आधार पर पोषण केंद्र, नर्सरी केंद्र आदि खोले जा रहे हैं और उन्हीं लाभार्थियों के लिए एक अस्वस्थ्य प्रतियोगिता शुरू की जा रही है। इसके चलते सार्वजनिक धन की बर्बादी भी हो रही है। आंगनवाड़ी सेविकाओं और सहायकों के साथ सरकार बहुत ही बुरा सलूक कर रही है। उन्हें महज ‘सामाजिक कार्यकर्ता’ मानने की आड़ में सरकार ग्रेच्युटी, पेंशन आदि सामाजिक लाभ भी देने के लिए तैयार नहीं है।
समुचित संसाधन से मिलेंगे नतीजे
महिला व बाल कल्याण मंत्री ने आईसीडीएस का ‘पुनर्गठन’ की बात कही है। किसी भी पुनर्गठन में पर्याप्त बजट आवंटन के जरिए उसे मजबूत किए जाने का प्रयास होना चाहिए न कि उसके निजीकरण का। खेदजनक है कि जहां 11 वीं योजना में आईसीडीएस के लिए 72,877.52 करोड़ रुपये की संशोधित योजना थी। वहीं पूरी योजना अवधि में करीब आधी राशि ही आवंटित की गई। महिला तथा बाल कल्याण मंत्री ने आईसीडीएस के लिए अगले पांच साल में 2 लाख करोड़ रुपये के आवंटन की मांग की है ताकि उसके कामकाज तथा उसके लिए ढांचागत सुविधाओं में बढ़ोतरी की जा सके। अगर हम मुट्ठीभर नैगम कम्पनियों व अमीरों पर विभिन्न कर रियायतों के जरिए पूरे 14,28,028 करोड़ रुपये का राजस्व लुटाया है तो देश के 16 करोड़ बच्चों और करोड़ों गर्भवती व नव-प्रसूताओं के लिए, इतना खर्चा करने से वित्त मंत्रालय को इनकार नहीं करना चाहिए।

पांच में एक ही बच्चा सही वजन का


भूख और कुपोषण पर एक सव्रे रिपोर्ट ने देश के विकास के तिलस्म को चूर-चूर कर दिया। रिपोर्ट के नतीजों ने देश के आलाकमान की नींद उड़ा दी है। यहां तक कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को स्वीकार करना पड़ा कि देश में भुखमरी और कुपोषण की स्थिति चिंताजनक है। जिन 100 जिलों को केंद्रित किया गया, वे थे-बिहार, झारखंड, मध्य प्रदेश, उड़ीसा, राजस्थान और उत्तर प्रदेश। इन राज्यों के जिलों में पाया गया कि 40 प्रतिशत बच्चों का वजन कम था यानी वे अंडरवेट थे और 60 प्रतिशत का कद सामान्य से कम था यानी उनका विकास रुका हुआ था। कम आय वाले, यानी गरीब परिवारों में कुपोषण अधिक पाया गया और इनमें भी मुस्लिम, अनुसूचित जाति व जनजाति वाले परिवारों में पोषण के संकेतक काफी चौंकाने वाले थे। हम जानते हैं कि बाल कुपोषण को मापने का एक महत्त्वपूर्ण आधार है जन्म के समय शिशु का वजन तो यह भी पाया गया कि 50 प्रतिशत वच्चों का वजन जन्म के समय 2.5 किलो से कम था और यह कि 92 प्रतिषत् माताओं को कुपोषण के बारे में कुछ भी जानकारी नहीं थी। कुछ और नतीजे भी सामने आए, मसलन कन्याओं के प्रति लापरवाही का रुख रहता है, साथ ही उन्हें बाल्यावस्था में पोषण का जो भी लाभ मिलता है, वह उम्र के साथ पलट जाता है। कुछ राज्यों में जन्म के समय कम वजन वाले शिशुओं का प्रतिशत इस प्रकार है-
सरकारी दावा था कि पिछले 7 वष्रों में बाल कुपोषण में 20.3 प्रतिशत कमी आई है। फिर भी आंकड़े बताते हैं कि कम वजन वाले वच्चे 42 प्रतिशत हैं और कम कद वाले 59 प्रतिशत; इनमें भी आधे बौने हैं। एक और तथ्य सामने आया कि निरक्षर माताओं के बच्चों में कम वजन वालों की संख्या अधिक थी-लगभग 45 प्रतिशत जबकि 10 साल तक शिक्षा प्राप्त माताओं में यह तादाद घटकर 27 प्रतिशत हो गई
तो पूरा हो चुका सहस्रब्दि विकास लक्ष्य
इस रिपोर्ट का जिक्र प्रधानमंत्री के भाषण में महत्व ग्रहण कर गया क्योंकि भारत को सहस्रब्दि विकास लक्ष्य को हासिल करना है और अभी हम काफी पीछे चल रहे हैं। सिंह ने अपने भाषण में कहा-‘हमारे देश में 6 वर्ष से कम आयु वाले बच्चों की संख्या 6 करोड़ है और हमारी अर्थव्यवस्था और हमारे समाज के स्वास्थ्य की कुंजी इस पीढ़ी के हाथ में है। उन्हें स्वीकारना पड़ा, ‘हमारे देश में कुपोषण की समस्या राष्ट्रीय शर्म का विषय है’। फिर क्या यह हैरानी की बात नहीं कि गरीबी और भूख से लड़ने के लिए जो खाद्य सुरक्षा विधेयक पारित किया जाना था, उसके लिए इच्छाशक्ति का अभाव ही नहीं दीखा बल्कि विधेयक पोषण की समस्या को छूता तक नहीं है। क्या इस बात को नजरअंदाज किया जा सकता है कि 7 वर्षों के अंतराल में प्रत्येक पांच बच्चों में से केवल एक बच्चा स्वस्थ वजन तक पहुंच सका। प्रधानमंत्री आगाह करते हैं कि इस समस्या का समाधान केवल आईसीडीएस पर निर्भर रहकर नहीं हो सकता बल्कि ‘नीति निर्माताओं और योजनाओं को लागू करवाने वालों को तमाम मसलों के अंतरसंबंधों को समझना होगा, मसलन शिक्षा और स्वास्थ्य, साफ-सफाई, पेय जल और पोषण के आपसी संबंधों को।’
खाद्यान्न सुरक्षा में दें पोषण को महत्त्व
पर प्रधानमंत्री ने सार्वजनिक वितरण पण्राली को व्यापक बनाने, कृषि के विकास को पोषण से जोड़ने, मिड-डे मील योजना और आईसीडीएस को मजबूत करने या फिर शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं को गरीबों की पहुंच में लाने के बारे में कुछ भी नहीं कहा और न ही खाद्य सुरक्षा विधेयक में पोषण के पक्ष को महत्त्व देने के बारे में चर्चा की। वे कहते हैं कि स्वस्थ रखने योग्य स्वास्थ्य पर केंद्रित करने से कुछ हासिल नहीं होगा। यह सच है कि बीमारी से बचाव महत्त्वपूर्ण है पर क्या यह संभव होगा, जब देश में एनएचआरएम और जननी सुरक्षा योजना में व्यापक भ्रष्टाचार दिखाई पड़ा है, यहां तक कि बड़े-बड़े घोटाले तक सामने आए हैं पर कोई ऑडिट की व्यवस्था नहीं की गई है। उत्तर प्रदेश में हज़ारों करोड़ रुपयों का घोटाला सामने है। मनमोहन जी का वादा कि 200 चुनिंदा जिलों में वे ‘मल्टीसेक्टोरल’ योजनाएं लागू करवाएंगे और कुपोषण के खिलाफ पूरे देश में अभियान चलवाएंगे; आकषर्क जरूर है पर जमीनी सचाई घोषणाओं से काफी दूर होती है। यह सूरत तब तक नहीं बदलेगी जब तक योजनाओं को लागू करने वाली एजेंसियों पर लापरवाही के बदले सख्त कानूनी सजा़ की नीति नहीं अपनाई जाती और लाभार्थियों के कानूनी अधिकार नहीं बढ़ाए जाते। इस बात का सबूत हमको आंकड़ों में मिलता है, मसलन 6 सबसे अच्छे बाल-विकास सूचकांक वाले जिलों में भी 33 प्रतिशत कम वजन वाले और 43 प्रतिशत कम कद वाले बच्चे पाए गए। आंगनवाड़ी स्कीम के बावजूद भारतीय महिलाओं का एक-तिहाई हिस्सा कम वजन वाला और आधे से अधिक हिस्सा, लगभग 56 प्रतिशत रक्ताल्पता से ग्रस्त पाया गया। 80 प्रतिशत बच्चे भी रक्ताल्पता से पीड़ित पाए गए। यदि भारत इसी रफ्तार से विकास करता रहा तो उसे मिलेनियम डेवलपमेंट गोल्स को हासिल करने में अभी 32 वर्ष और लगेंगे। देश के 8.2 की जीडीपी दर को देखते हुए क्या यह हमारे लिए अशोभनीय नहीं है ?
कृषि को वैीकरण से मुक्त कीजिए
कृषि विकास का प्रश्न हमारे देश के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण है क्योंकि ग्रामीण आय का 50 प्रतिशत कृषि क्षेत्र से आता है और हमने पहले ही कहा है कि आय से पोषण का गहरा ताल्लुक है। महिला श्रमिकों का 80 प्रतिशत हिस्सा भी कृषि क्षेत्र में कार्यरत है। इसलिए उनकी स्थिति को बदले बिना बच्चों के बेहतर पोषण की गारंटी करना संभव नहीं है। पर कृषि पर वैीकरण का ऐसा कुप्रभाव पड़ा है कि साल भर इस क्षेत्र में काम मिल पाना संभव नहीं है। कृषि में जो परिवर्तन किए जा रहे हैं, वे न ही आम किसान के हक में हैं, न ही खेतिहर मजदूर के और न ही खाद्यान्न के उपभोक्ताओं के हित में। निर्यात के लिए नकदी फसल उत्पादन पर अधिक जोर है और बड़ी परियोजनाओं, विशेष आर्थिक क्षेत्रों और बांधों व पर्यटन केंद्रों आदि के लिए कृषि भूमि का अधिग्रहण किया जा रहा है। इस संदर्भ में क्या कानूनी परिवर्तन होंगे यह अभी देखना बाकी है। दूसरी ओर, कृषि लागत सामग्री पर अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष व वि वैंक के इशारे पर सब्सिडी घटाई जा रही है, जिसके चलते कृषि न ही व्यवहार्य न लाभकर साबित हो रहा है। क्रेडिट कार्ड देकर और गाहे-बगाहे उनके कर्ज माफ करके किसानों की खुदकुशी पर रोक नहीं लगाई जा सकती। जहां गेहूं-चावल के स्टाक सड़ जाते हैं, कुपोषण का मुकाबला करने के लिए दाल, दूध, अंडे और मांस की खपत बढ़ानी चाहिए पर इनका उत्पादन ही जरूरत से कम रह जाता है। सार्वजनिक वितरण पण्राली भी इन वस्तुओं का वितरण नहीं करती। राशन पण्राली को व्यापक बनाने की जगह उसे टाग्रेटेड बनाकर व बीपीएल सूची को छोटे से छोटा बनाने की नित नई तरकीबों से गरीबी के आंकड़ों को छिपाया जा रहा है। महिला उत्पादकों को सशक्त बनाने की जगह उन्हें स्वयं सहायता समूहों की सदस्यता देकर अधिकारों से वंचित और व्यापक भ्रष्टाचार का शिकार बनाया जा रहा है। यही नहीं मनरेगा के जरिये ग्रामीण रोजगार में जिस तरह इज़ाफा हो सकता है, उसे भी सीमित करने की नीति बनाई जा रही है। यदि हम कुपोषण और भुखमरी के अन्य कारकों को देखें तो समझ सकेंगे कि वृहद् संरचनात्मक मुद्दे भी मुंह बाएं हल तलाश रहे हैं-मसलन गैरबराबरी-सामाजिक या लैंगिक व आर्थिक, निम्न जीवन स्तर, शिक्षा और स्वास्थ्य का निजीकरण, रोजगार का अभाव, श्रम की कठोर व विपरीत स्थितियां, विस्थापन, भूमि सुधार न होना आदि। ऐसे में गरीब जनता स्थायी विपन्नता के कुचक्र में फंस जाती है, जिससे निकल पाना आसान नहीं होता। अनूसूचित जाति व जनजाति के लोग इसके सबसे अधिक शिकार होते हैं। विपन्नता का सीधा प्रभाव स्वास्थ्य पर पड़ता है और अस्वस्थ माताओं के बच्चे भी स्थायी गरीबी के कुचक्र में जकड़ जाते हैं, क्योंकि उनकी उत्पादन क्षमता कम हो जाती है। यह भी देखा गया है कि ग्रामीण इलाकों में कृषि मजदूर व शहरी क्षेत्रों में अस्थायी श्रमिक सबसे कम आय में जीवनयापन को बाध्य होते हैं। ऐसे परिवारों को केंद्र में रखकर नीति निर्माण पर बल देना होगा वरना आंकड़ों की जादूगरी देश को विकास के रास्ते पर नहीं ले जा सकेगी।

दूर करें राष्ट्रीय शर्म


भूख और कुपोषण पर रिपोर्ट हंगामा जारी करते हुए, जो कुछ गैरसरकारी संगठनों (एनजीओ) तथा नैगम कम्पनियों द्वारा कराए गए सव्रे पर आधारित है, प्रधानमंत्री ने पछतावे के स्वर में कहा, कुपोषण की समस्या, राष्ट्रीय शर्म का विषय है। बेशक, यह राष्ट्रीय शर्म का विषय है। लेकिन जैसी कि उम्मीद की जा सकती थी, इस मौके पर प्रधानमंत्री अपनी ही सरकार के इस आशय के हवाई दावों पर चुप ही लगा गए कि भारत ने एक उदित अर्थव्यवस्था का दर्जा हासिल कर लिया है। प्रधानमंत्री जी, अपने शुरू किए कथित आर्थिक सुधारों के 20 वर्ष की तथाकथित भव्य कामयाबियों पर भी चुप लगा गए। याद रहे कि अब तक तो पूरे देश को यही समझाने की कोशिशें की जाती रही थीं कि इन कामयाबियों से हमारे देश की जनता की जिंदगी खुद ब खुद बेहतर हो जाने वाली है। लेकिन खुद प्रधानमंत्री द्वारा जारी की गई रिपोर्ट तो यही बता रही थी कि हमारे देश में 5 वर्ष से कम आयु के 42 फीसद बच्चे अपनी आयु के लिहाज से सामान्य से काफी कम वजन के हैं और 59 फीसद बच्चे मठुराए हुए यानी अपनी आयु के लिहाज से काफी कम लंबाई के हैं। 2011 के दौरान, देश के 112 ग्रामीण जिलों में यह सव्रे किया गया है, जिनमें देश के करीब 20 फीसद बच्चे रहते हैं। इनमें 100 जिले यूनीसेफ द्वारा 2009 में विकसित बाल विकास सूचकांक में सबसे नीचे के पायदान के जिलों में से लिए गए थे।
चौंकाने वाले नहीं पीएम के खुलासे
हालांकि, प्रधानमंत्री का स्वर ऐसा था, जैसे वे देश को कोई बहुत ही चौंकाने वाले जानकारी दे रहे हों, वास्तव में सव्रेक्षण के इन नतीजों में नया कुछ भी नहीं है। खुद सरकार की अपनी एजेंसियां, जिनके अध्ययन का दायरा मौजूदा अध्ययन से कहीं व्यापक है, पहले ही यह साबित करती रही हैं कि मौजूदा नव-उदारवादी आर्थिक सुधारों ने, जो अब से दो दशक पहले तत्कालीन वित्त मंत्री की हैसियत से मनमोहन सिंह ने ही शुरू किए थे, हमारे एक देश में दो देशों का निर्माण करने का ही काम किया है और इन दो देशों के बीच आर्थिक खाई चौड़ी से चौड़ी ही होती गई है। आइए ! हम कुछ सरकारी एजेंसियों की ही आधिकारिक रिपोटरे पर एक नजर डाल लें। गरीबी के आकलनों से जुड़े विवादों को अगर हम कुछ देर के लिए उठाकर परे भी रख दें, तब भी योजना आयोग द्वारा पिछले ही दिनों जारी की गई मानव विकास रिपोर्ट ही यह दिखाती है कि करीब 31 करोड़ भारतवासी, आधिकारिक रूप से परिभाषित गरीबी की रेखा के नीचे जी रहे हैं। यह भी कि खुद सरकारी आंकड़ों के ही अनुसार, 1973-74 से लगाकर अब तक, इस संख्या में सिर्फ 1 करोड़ 90 लाख की कमी हुई है। गरीबी के आकलनों की घोर अपर्याप्तता को अगर भूल भी जाएं तब भी, हालात कितने दयनीय हैं; इनका पता इस तथ्य से लगता है कि 1983 से 2005 के बीच, कैलोरी (काबरेहाइड्रेट) आहार तथा दालों (प्रोटीन) के औसत प्रति व्यक्ति उपभोग में, ग्रामीण इलाकों में पूरे 8 फीसद की और शहरी इलाकों में 3 फीसद की गिरावट ही दर्ज हुई है। भूख के पहलू से हालात किस कदर चिंताजनक हैं, इसका अंदाजा इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि पूरे देश में एक भी राज्य नहीं है, जहां गरीबी का आंकड़ा 10 फीसद से नीचे हो। भारत में तीन वर्ष से कम आयु के आधे बच्चे कुपोषण के शिकार हैं, जो उप- सहारावी अफ्रीकी देशों से भी बदतर हैं। आधे बच्चों का पूर्ण टीकाकरण तक नहीं हुआ है और इसके चलते उनमें कितने ही ऐसी बीमारियों के चलते काल के गाल में समा जाते हैं, जिन्हें पूरी तरह से रोका जा सकता है। जहां तक देश की जनता के लिए स्वास्थ्य-सुविधाओं का सवाल है, स्वास्थ्य पर हमारे देश का कुल खर्च, जिसमें सार्वजनिक तथा निजी, हर तरह के खच्रे शामिल हैं, सकल घरेलू उत्पाद के हिस्से के तौर पर, समूचे अफ्रीका के खच्रे के अनुपात से भी कम है। स्वतंत्रता के साठ साल बाद भी, हमारे यहां सफाई आदि की व्यवस्था की हालत दयनीय है और करीब 50 फीसद घरों में शौचालय तक नहीं हैं। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सव्रे (एनएफएचएस)-3 में, जो छह वर्ष के अंतराल पर किया गया था, एनएफएचएस-2 में दर्ज हालात के मुकाबले, बहुत ही चिंताजनक गिरावट दर्ज की गई थी। 6 से 35 वर्ष तक आयु के बच्चों में, खून की कमी के शिकार बच्चों का हिस्सा 74.2 फीसद से बढ़कर 79.2 फीसद हो गया। 15 से 49 वर्ष तक आयु की विवाहिताओं के लिए, यही अनुपात 51.8 से बढ़कर 56.2 फीसद हो गया। इसी आयु वर्ग में गर्भवती महिलाओं के मामले में खून की कमी की शिकार महिलाओं का अनुपात 49.7 फीसद से बढ़कर 57.9 फीसद हो गया। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सव्रे-3 के ही अनुसार तीन वर्ष से कम आयु के 38.4 फीसद बच्चे मठुराए हुए यानी अपनी आयु के लिहाज से काफी कम लंबे हैं और 46 फीसद बच्चे अपनी आयु के मुकाबले काफी कम वजन के हैं। इस आयु श्रेणी के 79.2 फीसद बच्चे खून की कमी के शिकार हैं। हमारे देश में माताओं और बच्चों की ऐसी हालत है!
जीवन-जीविका के स्तर से जुड़ा कुपोषण
तमाम रिपोर्टे इसी तथ्य की पुष्टि करती हैं कि हमारे बच्चों का स्वास्थ्य, उनके परिवारों के जीवन तथा जीविका के स्तर से सीधे-सीधे जुड़ा हुआ है। ऊंची वृद्धि दर की पटरी पर देश को दौड़ाने के सारे शोर-शराबे के बावजूद, राष्ट्रीय नमूना सव्रेक्षण संगठन (एनएसएसओ) के आकलन के अनुसार हमारे देश में बेरोजगारी की दर, 2007 के 2.8 फीसद के स्तर से तेजी से बढ़कर, 2009-10 में 9.4 फीसद पर पहुंच गई। यहां तक कि जो रोजगारशुदा दर्ज किए गए हैं, उनमें से भी सिर्फ 16 फीसद का काम नियमित वेतन देता है जबकि 43 फीसद तथाकथित स्वरोजगार में लगे हुए हैं और 39 फीसद एकदम अस्थायी (कैजुअल) श्रमिक हैं। बहरहाल, हंगामा रिपोर्ट के बहुत ही विवादास्पद निष्कर्ष को पकड़कर कि 2004 से 2011 के बीच, कम वजन के बच्चों का अनुपात 53 फीसद से घटकर 42 फीसद पर आ गया है, प्रधानमंत्री यह दावा करते हैं, पिछले सात साल में कुपोषण में 20 फीसद की यह गिरावट, एनएफएचएस-3 में प्रदर्शित गिरावट की दर से बेहतर है। बहरहाल, इसके साथ ही वह यह भी जोड़ते हैं, मुझे जिस चीज की चिंता है और जिसकी चिंता सभी जागरूक नागरिकों को होनी चाहिए, वह यह है कि हमारे देश के 42 फीसद बच्चे अब भी सामान्य से कम वजन के हैं। यह अस्वीकार्य रूप से ऊंची दर है। यह विडंबनापूर्ण है कि भारत के सामने पोषण संबंधी चुनौतियों से संबंधित राष्ट्रीय परिषद के अध्यक्ष, खुद प्रधानमंत्री जी ही हैं। इस समस्या से निपटने के लिए जो अनेकानेक कदम सुझाए गए हैं, उनमें एक कदम समेकित बाल विकास परियोजना (आइसीडीएस) का सार्वभौम बनाया जाना भी है। इसके बावजूद, सरकार इस क्षेत्र की उपेक्षा करना जारी रखे हुए है और उसने देश में आइसीडीएस को सार्वभौम बनाने के लिए आवश्यक वित्तीय संसाधनों का वितरण तक नहीं किया है। भारत, अपने सकल घरेलू उत्पाद का एक फीसद से भी कम सार्वजनिक स्वास्थ्य पर खर्च करता है जो कि दयनीय है। वास्तव में 22,300 करोड़ रुपये के स्वास्थ्य बजट के दयनीय आंकड़े से, आठ गुना बड़ा तो 2-जी घोटाला ही था।
प्राथमिक स्वास्थ्य बने सार्वभौम
अगर प्रधानमंत्री वाकई देश के भविष्य की इस दयनीय तस्वीर को बदलना चाहते हैं तो सबसे पहला काम तो प्राथमिक स्वास्थ्य रक्षा को सार्वभौम बनाना ही होना चाहिए। इसके लिए हमारे सकल घरेलू उत्पाद का कम से कम 3 फीसद स्वास्थ्य रक्षा पर खर्च करने की जरूरत होगी। लेकिन इससे कहीं कई गुनी राशि तो सरकार इस समय अपने वैध कर दावों में से ही माफ कर देती है। पिछले तीन वर्षो में इस तरह छोड़ा गया कर राजस्व, पूरे 14,28,028 करोड़ रुपये का बैठता है। इसमें से 3,63,875 करोड़ रुपये तो नैगम कम्पनियों तथा धनी तबकों को कर रियायतों के रूप में ही पकड़ाए गए हैं। इसलिए, जब तक नव-उदारवादी सुधारों के मौजूदा रास्ते को नहीं छोड़ा जाता है, जो अमीर को और अमीर तथा गरीब को और गरीब बनाने का ही काम करता है, हमारी जनता के स्वास्थ्य में और इस तरह हमारे देश के ही स्वास्थ्य में कोई महत्त्वपूर्ण सुधार संभव नहीं होगा। एक देश में बसे दो देशों-भारत तथा इंडिया-के बीच की खाई को बढ़ाने वाले रास्ते को छोड़ने और संपन्न तबकों को रियायतों के जरिए पकड़ाए जाने वाले संसाधनों का सार्वजनिक निवेशों के जरिए, बहुत ही जरूरी ढांचागत सुविधाओं का निर्माण करने तथा इस क्रम में बड़े पैमाने पर रोजगार पैदा करने की जरूरत है। इसी तरह से, जनता के जीवन स्तर तथा उसके स्वास्थ्य में सुधार किए जा सकता है ताकि हम एक बेहतर भारत का निर्माण कर सकें।