संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम की मानव विकास से जुड़ी 21वीं रिपोर्ट हाल ही में प्रकाशित हुई है। इस रिपोर्ट में 187 देशों की सूची में भारत को 134वां स्थान मिला है। रिपोर्ट का इस वर्ष का विषय वैश्विक स्तर पर दीर्घकालीन विकास और न्यायसंगत प्रगति है। गौरतलब है कि विगत वर्ष की 20वीं रिपोर्ट में सामाजिक विषमता, लिंग असमानता और बहुआयामी गरीबी के प्रभावों का आकलन किया गया था। इस वर्ष रिपोर्ट में संयुक्त राष्ट्र मानव विकास सूचकांक (यूएनएचडीआइ) के अंतर्गत स्वास्थ्य, शिक्षा एवं ज्ञान, लैंगिक विषमता, आय और जीवन स्तर के संकेतकों के साथ पर्यावरणीय खतरों तथा उनसे निपटने के लिए किए जाने वाले उपायों के माध्यम से दीर्घकालिक प्रगति का आकलन किया गया है। इस रिपोर्ट की खास बात यह है कि संयुक्त राष्ट्र के इस मानव विकास के सूचकांकों में भारत 133 देशों से भी पीछे है। आश्चर्य की बात यह है कि इस सूचकांक में श्रीलंका और युद्ध की विभीषिका से गुजरने वाला इराक भी हमसे बेहतर स्थिति में है। मानव विकास लोगों की आजादी तथा उनकी क्षमताओं का विस्तार है। मानवीय विकास का अर्थ यह भी है कि कैसे मानव अपने जीवन को समाजोपयोगी व मूल्य प्रधान बनाकर अपनी क्षमताओं का भरपूर प्रयोग करते हुए स्वयं के व राष्ट्र के लिए उपयोगी बन सकता है। रिपोर्ट में इस बहस को भी आगे बढ़ाया गया है कि कैसे पर्यावरण की विकृति सामाजिक विषमता को बढ़ाते हुए वंचित समूहों पर नकारात्मक प्रभाव डाल रही है? साथ ही कैसे मानवीय विकास के क्षेत्र में बढ़ती असमानताएं पर्यावरण विकृति को विस्तार दे रही हैं? रिपोर्ट में इस बहस को भी बल मिला है कि क्या मानव निर्मित पूंजी प्राकृतिक संसाधनों का स्थानापन्न बन सकती है? क्या मानव का उचित विकास प्राकृतिक संसाधनों के रखरखाव में सहायक हो सकता है? कुल मिलाकर मानव विकास का प्रमुख उद्देश्य वैश्विक स्तर पर एक ऐसे वातावरण का निर्माण करना है जहां लोग स्वस्थ और शिक्षित होकर न्यायपूर्ण जीवन जीते हुए जीवन की रचनात्मकता को भी बनाए रख सकें। यूएन की मानव विकास से जुड़ी इस रिपोर्ट को केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश ने खारिज कर झेंप मिटाने की कोशिश की है। क्या हम इंकार कर सकते हैं कि मानवीय विकास के सामाजिक पहलू मसलन साक्षरता, शिक्षा, स्वास्थ्य, पेयजल, पोषण और खाद्य सुरक्षा के लिहाज से हम दुनिया से पीछे चल रहे हैं। साथ ही हम अपनी उस आबादी की भी उपेक्षा कर रहे हैं जो बुनियादी सुविधाओं से वंचित है। देश में जो भी कल्याणकारी योजनाएं संचालित हैं उनमें व्याप्त भ्रष्टाचार इन योजनाओं के लाभ को अभावग्रस्त तबकों तक नहीं पहुंचने दे रहा। यह कैसा विरोधाभास है कि एक ओर वैश्विक स्तर पर भारत को महाशक्ति बनाने की घोषणा की जा रही है तथा दूसरी ओर कुपोषण व भुखमरी के स्तर पर देश को नीचा देखना पड़ रहा है। देश में छह हजार टन से भी अधिक अनाज सड़कों व गोदामों में सड़ जाता है। इसी का परिणाम था कि पिछले साल उच्चतम न्यायालय तक को साफ कहना पड़ा कि जिस देश में करोड़ों लोग भूख से बेहाल हैं, वहां अन्न के एक दाने की बर्बादी भी अपराध की श्रेणी में आती है। देश में जन वितरण प्रणाली की स्थिति यह है कि केवल 57 फीसदी बीपीएल परिवारों को ही इसका लाभ मिल पा रहा है। आंकड़े बताते हैं कि भारत में 25 लाख शिशुओं की अकाल मृत्यु होती है तथा 42 फीसदी बच्चे गंभीर कुपोषण के शिकार हैं। इस संबंध में भारत की स्थिति दक्षिण एशिया और अफ्रीका के गरीब देशों से भी बदतर है। कड़वा सच यह है कि दुनिया के सर्वाधिक गरीब अपने देश में ही हैं। लैंगिक असमानता के सूचकांक के अंतर्गत रिपोर्ट में भारत को 129वां स्थान मिला है। इसलिए दक्षिण एशिया में भारत केवल अफगानिस्तान से ही आंशिक रूप से बेहतर स्थिति में है। दक्षिण एशिया की महिलाएं संसदीय प्रतिनिधित्व एवं श्रमिक बल की भागीदारी में पुरुषों की तुलना में काफी पिछड़ी हुई हैं। इस रिपोर्ट में स्पष्ट चेतावनी दी गई है कि यदि हमने मानव विकास के हित में ग्लोबल पर्यावरण संतुलन बनाने का प्रयास नहीं किया तो हमें विनाशकारी परिणाम भुगतने होंगे। इस मानव विकास रिपोर्ट में भारत को मध्यम और मिश्रित अर्थव्यवस्था वाले देशों में रखा गया है, परंतु सच्चाई यह है कि यहां लागू नवीन उदारवादी अर्थव्यवस्था ने अमीरों का भला अधिक किया है। इन बाजारवादी और आर्थिक उदारवादी नीतियों का प्रभाव यह हुआ है कि देश में एक छोटे वर्ग के पास अपार धन संपदा एकत्रित होती रही, जबकि एक बड़ा वर्ग न्यूनतम रोजी-रोटी के लिए जूझता रहा। देश में भूखे, कुपोषित और बीमार बच्चों तथा बेरोजगार युवाओं की फौज तैयार हो रही है। हमारे अति उपभोग से पर्यावरण निरंतर विकृत हो रहा है। संपूर्ण विश्व में आर्थिक विकास के क्षेत्र में हमारी साख और धाक लगातार बढ़ रही है, परंतु मानव विकास के मुद्दों पर हम लगातार पिछड़ रहे हैं। सहश्चाब्दि विकास लक्ष्य-2015 से भी हम अभी दूर ही हैं। आर्थिक उदारीकरण से जुड़ी नीतियों का लाभ देश के प्रत्येक वर्ग को मिले, इसके लिए हमें मानवीय विकास के सामाजिक-आर्थिक मुद्दों को राष्ट्र की आवश्यकताओं के साथ जोड़ना होगा। (लेखक समाजशास्त्र के प्राध्यापक हैं)
Wednesday, November 9, 2011
संसाधनों के प्रबंधन की जरूरत
जनसंख्या विस्फोट अब अंतराष्ट्रीय समस्या बन रहा है। वास्तव में अब कुपोषित बच्चों की संख्या भी एक अरब को पार कर गई है। बढ़ती आबादी को लेकर खाद्यान्न संकट की जो भयावहता दिखाई जा रही है वह भी गलत है। एक व्यक्ति को 2400 कैलोरी खाद्यान्न चाहिए जबकि प्रति व्यक्ति उपलब्ध कैलोरी 4600 है। समस्या खाद्यान्न की नहीं उससे ईंधन बनाए जाने, उसके सड़ने और असमान वितरण की है। यदि इन बदतर हालातों को काबू कर लिया जाए तो विस्फोटक आबादी के उचित प्रबंधन की जरूरत 2070 के आसपास तक होगी। यह पहला अवसर है जब 13 साल के बेहद सीमित कालखंड में दुनिया की आबादी एक अरब बढ़ गई। भविष्यवक्ताओं का अनुमान है कि आबादी को 8 अरब होने में अब 15 साल लगेंगे और करीब 60 साल का लंबा फासला तय करके यह आबादी 9 अरब के शिखर पर होगी। वाशिंगटन भूनीति संस्थान के मुताबिक इतनी आबादी का पेट भरने के लिए 16 सौ हजार वर्ग किमी अतिरिक्त कृषि भूमि की जरूरत होगी, लेकिन कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि वर्तमान उत्पादन 11 अरब आबादी के लिए पर्याप्त है। इसके बाद आबादी घटने का सिलसिला शुरू हो जाएगा और 21वीं एवं 22वीं सदी की संधि बेला के करीब आबादी घटकर लगभग साढ़े तीन अरब रह जाएगी। लिहाजा अगले 60-70 सालों के लिए आबादी को एक ऐसे कुशल प्रबंधन की जरूरत है जिसके चलते खाद्यान्न व पेयजल की समुचित उपलब्धता तो हो ही स्वास्थ्य व अन्य बुनियादी सुविधाओं में भी वितरण की समानता हो। फिलहाल दुनिया के दस सर्वाधिक आबादी वाले देशों में केवल तीन विकसित देश अमेरिका, रूस और जापान शामिल हैं। दुनिया को यदि विकसित और विकासशील देशों में विभाजित करें तो विकसित देशों में 32 फीसदी आबादी है और विकासशील देशों में 68 फीसदी। यह औसत लगातार घट रहा है। संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष के मुताबिक 2050 में विकासशील देशों में 91 फीसदी आबादी रह रही होगी जबकि विकसित देशों में महज 9 फीसदी। यह चुनौती खाद्यान्न, पेयजल, पेट्रोलियम पदार्थो की उपलब्धता का संकट तो बढ़ाएगी ही बेरोजगारी, आर्थिक मंदी और पर्यावरण जैसे संदर्भो में भी इसका आकलन करना होगा। हालांकि परिवार नियोजन जैसे उपायों के कारण आज विश्व की जनसंख्या महज एक प्रतिशत की दर से बढ़ रही है जो 1960 के दशक में दो प्रतिशत थी। 1970 में प्रति महिला प्रजनन दर 4.45 थी जो वर्तमान में 2.45 रह गई है और 2.1 का लक्ष्य है। इससे आबादी के स्थिरीकरण का सिलसिला शुरू हो जाएगा। इसके अलावा उपभोग की शैली को बढ़ावा मिलने तथा उद्योगीकरण व शहरीकरण के कारण करीब 70 लाख हेक्टेयर वन प्रति वर्ष समाप्त हो रहे हैं। इससे ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन बढ़ रहा है। इन गैसों को बढ़ाने में अमेरिका का योगदान सर्वाधिक है। हालांकि वह इसका अभिशाप भी भोगने को विवश है। वहां हर साल 50 हजार लोग केवल वायु प्रदूषण के चलते मौत के आगोश में समा रहे हैं। इधर ऊर्जा संकट भी चरम पर है। ऊर्जा की 40 फीसदी जरूरतें पेट्रोलियम पदाथरें से पूरी होती हैं, जिसकी आपूर्ति लगातार घट रही है। इस कारण दुनिया अंधेरे की ओर बढ़ती दिखाई दे रही है। अमेरिका ने तेल पर कब्जे के लिए ही इराक पर हमला बोला थ। लीबिया में नाटों देशों का दखल इसी लक्ष्य के लिए था। ऊर्जा के लिए राष्ट्रों के अस्तित्व से खेलने की बजाय कारों और वातानुकूलन में जो ऊर्जा खपाई जा रही है उस पर यदि अंकुश लगे तो रसोई और रोशनी के लिए ऊर्जा संकट से निजात मिल सकती है। बहरहाल अमीरी और गरीबी की लगातार बढ़ती खाई से जो सामाजिक असमानताएं उपजी हैं उन्हें पाटने की जरूरत है। धरती 11 अरब लोगों की भूख के बराबर खाद्यान्न उपजा रही है फिर भी कुपोषण और भुखमरी की समस्या है। यहां छत्तीसगढ़ में बैगा आदिवासी समूह में प्रचलित उस लोक कथा का उल्लेख करना जरूरी है जिसमें दुनिया की समूची आबादी की चिंता परिलक्षित है। बैगा आदिवासी जब पैदा हुआ तो उसे ईश्वर ने 9 गज का कपड़ा उपयोग के लिए दिया। बैगा ने ईश्वर से कहा मेरे लिए 6 गज कपड़ा ही पर्याप्त है। बाकी किसी अन्य जरूरतमंद को दे दीजिए इस तरह उसने तीन गज कपड़ा फाड़कर ईश्वर को लौटा दिया। साफ है कि बढ़ती आबादी को संसाधनों के समान बंटवारे के प्रबंध कौशल से जोड़ने की जरूरत है न कि उस पर बेवजह की चिंता करने की।
Monday, October 24, 2011
श्रम सुधारों का समय
भारत की सबसे बड़ी कार निर्माता कंपनी मारुति-सुजुकी इंडिया के मानेसर संयंत्र में 14 दिन से चली आ रही हड़ताल खत्म हो गई है। कंपनी प्रबंधन, कर्मचारी और हरियाणा सरकार के बीच एक त्रिपक्षीय समझौते के बाद यह हड़ताल खत्म हुई। समझौते के तहत प्रबंधन 64 स्थायी कर्मचारियों को वापस लेने पर सहमत हो गया, लेकिन 30 कर्मचारियों का निलंबन जारी रहेगा। तीनों पक्षों में इस बात पर भी सहमति बनी कि 1200 अस्थायी कर्मचारियों को भी बहाल कर दिया जाएगा। शिकायतों के निस्तारण एवं श्रमिकों के कल्याण के लिए दो समितियों के गठन पर भी सहमति बनी ताकि संयंत्र में कार्य के अनुकूल वातावरण उपलब्ध कराया जा सके। मारुति के 30 साल के इतिहास में सात हड़तालें हो चुकी हैं जिनमें से चार हड़तालें इसी साल हुईं। इस साल मई में मारुति के मानेसर प्लांट के संविदा कर्मचारियों ने अलग यूनियन बनाने की मांग को ठुकराए जाने पर हड़ताल की थी। उनका मानना था कि स्थायी कर्मचारियों की यूनियन की प्रबंधन से मिलीभगत है। पहले दौर की हड़ताल खत्म हुई तो कर्मचारियों को अच्छे आचरण के बांड पर हस्ताक्षर करने को कहा गया। मारुति प्रबंधन का कहना है कि ये अनुशासन संबंधी साधारण शर्ते हैं। दरअसल मारुति में हड़ताल भारतीय श्रम बाजार में श्रमिकों और प्रबंधन के बिगड़ते रिश्तों की कहानी है। प्रतिस्पर्धी कंपनियों को सस्ता श्रम चाहिए। वे ठेकेदारों के माध्यम से सस्ते मजदूरों को प्राथमिकता देते हैं। इन्हें चिकित्सा, बीमा, बचत, विकलांगता कवर जैसी सुविधाएं नहीं देनी पड़तीं। वेतन में भी भारी अंतर रहता है। जैसे मारुति में मुट्ठी भर स्थायी कर्मचारियों को 25,000 रुपये प्रतिमाह दिए जाते हैं जबकि ठेके पर रखे कर्मचारियों को समान काम के लिए 4,500 से 12,000 रुपये मिलते हैं। राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण संगठन की रिपोर्ट के अनुसार देश में कामगारों की संख्या लगभग 46 करोड़ है जिसमें 94 फीसदी असंगठित क्षेत्र में काम करते हैं। अर्थव्यवस्था में अहम योगदान असंगठित कामगार सामाजिक सुरक्षा की सुविधाओं से वंचित है। असंगठित क्षेत्र के मजदूरों में 90 फीसदी से ज्यादा को आमतौर पर सरकार की ओर से निर्धारित न्यूनतम मजदूरी से भी कम पैसे मिलते हैं। श्रमिक हितों से संबंधित शायद ही किसी कानून का फायदा इन्हें मिल पाता है। असंगठित क्षेत्र में कार्यरत महिलाओं की संख्या लगातार बढ़ी है, लेकिन वे मजदूरी में भेदभाव से लेकर कई तरह के शोषण का शिकार हैं। यही कारण है कि असंगठित कामगार औद्योगिक क्षेत्र में काम करने से हिचकते हैं। दरअसल औद्योगिक समूह अभी भी अनुबंधित श्रम कानूनों को पूरी तरह से समझ नहीं पाए हैं। उद्योग जगत कामगारों के प्रति जवाबदेह नहीं लगता। श्रमिकों को केवल ठेकेदार तक ही सीमित कर दिया गया है जो कानूनों और नियंत्रण से परे है। औद्योगिक इकाई इस बात की जिम्मेदारी नहीं लेती कि ठेकेदार मजदूरों को उचित मजदूरी देते भी हैं या नहीं। देश में श्रमिकों के हित में उठाए गए कदमों का दायरा संगठित क्षेत्र के श्रमिकों तक सीमित रहा है। हालांकि सरकार ने असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों के लिए एक राष्ट्रीय सामाजिक सुरक्षा कोष के गठन को मंजूरी दी है। 1,000 करोड़ रुपये के इस कोष से संचालित योजनाओं का लाभ उन 43.3 करोड़ श्रमिकों को मिलेगा जो बुनकर, रिक्शा चालक या दिहाड़ी श्रमिक के रूप में काम करते हैं। सरकार ने गरीब परिवारों के लिए राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना, असंगठित क्षेत्र के लोगों के लिए वृद्धावस्था पेंशन और स्वावलंबन जैसी कई योजनाएं चलाई हैं, लेकिन जागरूकता के अभाव में आज भी बहुत कम श्रमिक परिवार इन कार्यक्रमों के बारे में जानते हैं। जरूरत के अनुसार इन कार्यक्रमों के लिए धन का आवंटन बहुत कम है। फिर बहुत सारी राशि बिचौलियों और भ्रष्ट कर्मचारियों की जेब में चली जाती है। जरूरत इस बात की है कि देश के श्रम बाजार की नीतियों का निष्पक्ष विश्लेषण हो और ऐसा रास्ता तैयार किया जाए जिसमें श्रम संसाधनों का एकतरफा दोहन न हो। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
मानव विकास में अभी भी काफी पीछे है बिहार
बिहार में आहिस्ता-आहिस्ता ही सही लोगों का जीवन स्तर सुधरने लगा है। योजना आयोग की इंडिया : ह्यूमन डेवलपमेंट रिपोर्ट 2011 में कहा गया है कि केरल, दिल्ली, हिमाचल, गोवा और पंजाब जैसे विकसित राज्यों की तुलना में बिहार मानव विकास के मामले में अभी भी काफी पीछे है। छत्तीसगढ़ और ओडि़सा ही सिर्फ उससे नीचे है। रिपोर्ट के मुताबिक पिछले कुछ वर्षो में बिहार में तेजी से आर्थिक विकास हुआ है, लेकिन मानव विकास इंडेक्स में गरीबी, स्वास्थ्य, शिक्षा और स्वच्छता की सुविधाओं की कमी के कारण यह दिखाई नहीं देता। हालांकि राज्य सरकार की ओर से गरीबी को कम करके इंडेक्स में सुधार के प्रयास किए जा रहे हैं। जून 2009 तक 40 लाख बीपीएल परिवारों और 24 लाख अंत्योदय परिवारों को राशन कार्ड बांटे गए। 2004 से 2008 के बीच अनुसूचित जाति-जनजाति के कल्याण पर खर्च की राशि दोगुनी हो गई। फिर भी मानव विकास इंडेक्स के मामले में बिहार अन्य राज्यों की तुलना में अभी काफी पीछे है। मानव विकास इंडेक्स के मामले में केरल (0.790) पहले नंबर पर, दिल्ली (0.750) दूसरे नंबर पर और हिमाचल प्रदेश (0.652) तीसरे स्थान पर हैं। सबसे नीचे की पायदान पर छत्तीसगढ़ (0.358) है। उड़ीसा (0.362) के साथ नीचे से दूसरे नंबर पर। बिहार (0.367) का नीचे से तीसरा स्थान है। यह बात जरूर देखने को मिल रही है कि बिहार, ओडि़सा और छत्तीसगढ़ जैसे गरीब राज्यों ने मानव विकास इंडेक्स के मामले में राष्ट्रीय औसत से तेजी के साथ विकास किया है। हालांकि अभी भी ये राज्य इस स्थिति में नहीं पहुंच पाए हैं कि इंडेक्स में कोई उलटफेर कर सके। बिहार में मानव विकास की स्थिति पर नजर दौड़ाए तो स्पष्ट है कि आय, शिक्षा और स्वास्थ्य तीनों क्षेत्रों में विकास हुआ है। शिक्षा के क्षेत्र में रफ्तार कुछ ज्यादा ही तेज है। सर्व शिक्षा अभियान, स्कूलों में बड़ी संख्या में अभियान चलाकर बच्चों का नामांकन, मुख्यमंत्री साइकिल योजना और बालिका पोशाक योजना का रंग शिक्षा के इंडेक्स में साफ-साफ झलक रहा है।
तरक्की कर रहे भारत में भूख और कुपोषण चरम पर
भारत में तेज आर्थिक विकास की तमाम कथाओं के मुकाबले यह कहानी बेहद उलटी, अचरज भरी और भयावह है। पिछले दशक की शानदार ग्रोथ के बावजूद भारत के सभी राज्यों में भूख व कुपोषण चरम पर है। एक भी राज्य ऐसा नहीं है, जो भूख से मुक्त होने के पैमाने के करीब फटकता हो। ऊंची आय वाले गुजरात, पंजाब जैसे राज्य हों अथवा बेहतर सामाजिक विकास वाला केरल, भूख के सूचकांक (हंगर इंडेक्स) पर यह तस्वीर बेहद डरावनी है। भूख-कुपोषण पर मानव विकास रिपोर्ट का रहस्योद्घाटन सनसनीखेज है। रिपोर्ट बताती है कि भारत भूख खत्म करने की लड़ाई हार गया है। सरकारी पैमाना कहता है कि भारत के ग्रामीण इलाकों में किसी व्यक्ति को स्वस्थ ढंग से जीने के लिए कम से 2400 कैलोरी और शहरी क्षेत्र में 2100 कैलोरी चाहिए। योजना आयोग की गरीबी रेखा का बुनियादी पैमाना भी यही है। मगर रिपोर्ट बताती है कि देश के 81 फीसदी ग्रामीण और 57 प्रतिशत शहरी इतना भी नहीं जुटा पाते। कुपोषण की समस्या केवल बच्चों की ही नहीं है, देश के करीब एक तिहाई वयस्क पुरुष व महिलाएं भी कुपोषण का शिकार हैं। इनका वजन (न्यूनतम बॉडी मास इंडेक्स 18.5) निर्धारित पैमाने से कम है। पांच साल से कम उम्र के बच्चों के मामले में हालत बहुत बुरी है। देश के 46 फीसदी बच्चे कुपोषित हैं। हिमाचल, पंजाब, केरल, सिक्किम, मणिपुर व मिजोरम बच्चों में कुपोषण के मामले में अफ्रीका के निर्धनतम सहारा मरुस्थल के देशों जैसे हैं। मानव विकास रिपोर्ट के अनुसार हंगर इंडेक्स यानी भूख सूचकांक में न्यूनतम स्तर 9.9 का है। भूख सूचकांक कुपोषण के तीन पैमानों पर आधारित है। किसी राज्य में भूख की स्थिति जानने के लिए नागरिकों में औसत कैलोरी (भोजन से मिलने वाली ऊर्जा) खपत, पांच साल से कम उम्र के बच्चों में कुपोषण, और पांच साल छोटे बच्चों की मृत्यु दर को आधार बनाया जाता है। विकास की ताजा चमक वाला गुजरात इस भूख सूचकांक पर 24.70 फीसदी अंकों के साथ 13वें नंबर पर है, यानी भूख से प्रभावित पांच प्रमुख राज्यों में शामिल है। छत्तीसगढ़, बिहार, झारखंड और मध्य प्रदेश इससे ज्यादा बुरी हालत में हैं। मध्य प्रदेश भूख सूचकांक में सबसे गंभीर राज्य के तौर पर दर्ज हुआ है। महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, हरियाणा जैसे राज्यों में भी भयानक भूख व कुपोषण है। कर्नाटक व केरल की 28 फीसदी आबादी कुपोषण का शिकार है, जबकि उत्तर प्रदेश में बाल मृत्यु दर 9 और पंजाब में 5.2 फीसदी है। अनाजों की उपलब्धता में कमी और गैर अनाज की खपत में बढ़ोतरी न होने के रेखांकित करते हुए मानव विकास रिपोर्ट कहती है कि भारत भुखमरी की अपनी बुनियादी चुनौती से अब तक नहीं निबट पाया है।
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