स्वास्थ्य क्षेत्र में सरकारी ढांचे की लचर स्थिति के बावजूद इस पर सरकारी उपेक्षा खत्म होने का नाम नहीं ले रही। योजना आयोग ने अपने ताजा आकलन में बताया है कि राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन (एनआरएचएम) के तहत बड़ी रकम इस क्षेत्र पर खर्च होने के बाद भी स्वास्थ्य पर सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का सरकार सिर्फ 1.3 फीसदी ही खर्च कर रही है। योजना आयोग ने अपनी मानव विकास रिपोर्ट- 2011 में स्वास्थ्य क्षेत्र की उपेक्षा पर खास ध्यान दिलाया है। इस रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 1990 में जहां प्रति हजार शिशु में 80 की मौत हो जाती थी, वहीं 2009 में भी यह सिर्फ 50 तक पहुंच सका है। शिशु मृत्यु दर (आइएमआर) को वर्ष 2015 तक 26.7 तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा गया था, लेकिन जिस तरह 20 साल में सिर्फ 30 बिंदुओं की कमी आई है, उसे देखते हुए यह लक्ष्य अब काफी चुनौतीपूर्ण हो गया है। इसी तरह मातृत्व मृत्यु दर (एमएमआर) में वर्ष 2003 से लेकर 2009 के दौरान सिर्फ 89 बिंदुओं की कमी आई है। पहले जहां एक लाख जीवित जन्म पर 301 माताओं की मौत हो रही थी, वहीं अब यह घटकर 212 रह गई, लेकिन 2012 तक इसे 100 तक पहुंचाने के लक्ष्य से यह बहुत दूर है। रिपोर्ट के मुताबिक राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन (एनआरएचएम) और जननी सुरक्षा योजना की वजह से संस्थागत प्रसव में तो बढ़ोतरी हुई है। 2006 तक जहां सिर्फ 39 फीसदी महिलाएं ही चिकित्सकीय निगरानी में बच्चे को जन्म दे रही थीं, वहीं 2009 तक यह अनुपात बढ़कर 78 फीसदी हो गया, लेकिन अभी इसे शत प्रतिशत तक पहुंचाना है। इसी तरह कुल प्रजनन दर (टीएफआर) के मामले में नौ राज्यों दिल्ली, हिमाचल प्रदेश, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, केरल, महाराष्ट्र, पंजाब, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल ने जरूर वर्ष 2008 तक 2.1 की दर हासिल कर ली है, लेकिन बिहार, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश जैसे गरीब राज्य में यह दर अब भी तीन से ज्यादा बनी हुई है। अपने देश में अब भी दस हजार की आबादी पर अस्पताल के सिर्फ नौ बिस्तर उपलब्ध हैं। जबकि चीन में यह अनुपात 30 है। इसी तरह भारत में प्रति दस हजार आबादी पर सिर्फ छह डॉक्टर उपलब्ध हैं, जबकि चीन में यह संख्या 14 है। नर्स के मामले में तो यह स्थिति बहुत ही खराब है। जहां विकसित देशों में प्रति सौ-डेढ़ सौ लोगों पर एक नर्स उपलब्ध है, भारत में 1205 लोगों पर एक नर्स है।
Monday, October 24, 2011
Saturday, October 15, 2011
भूखे गरीबों का बढ़ता आंकड़ा
सरकार के तथाकथित गंभीर प्रयासों के बावजूद खाद्य पदाथरे की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं। कई महीनों से इसकी महंगाई दर नौ प्रतिशत से ऊपर बनी हुई है। उम्मीद थी कि बढ़िया मानसून और भारतीय रिजर्व बैंक के आर्थिक उपायों से कीमतें काबू में आएंगी, पर ऐसा नहीं हुआ। 24 सितम्बर को खत्म हुए सप्ताह में खाद्यों की मंहगाई दर 9.41 प्रतिशत के रिकार्ड स्तर पर पहुंच गई। हालांकि ताजा आकड़ें मामूली गिरावट दर्शा रहे हैं। इस मुसीबत को बढ़ाने में ज्यादा योगदान सब्जियों और फलों का रहा। जैसे-जैसे खाद्यों की कीमतों में इजाफा होता जाता है, वैसे- वैसे गरीब की थाली सिकुड़ती जाती है। यह सिलसिला बहुत नया और केवल अपने देश तक सीमित नहीं है। यह आंच पूरी दुनिया में गरीबों को झुलसा रही है। इसीलिए यह मुद्दा वैिक स्तर पर गंभीर चिंता और बहस का विषय बन गया है। इस साल संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) की पहल पर दुनिया भर में वि खाद्य दिवस के मौके पर बढ़ती खाद्य कीमतों को मुख्य विषय बनाया गया है। एफएओ की रिपोर्ट कहती है कि 1975 से 2000 के बीच अनाज की कीमतों में ज्यादा उछाल या उलट-फेर नहीं देखा गया। आबादी बढ़ने के बावजूद गरीबों की अनाज तक पहुंच बनी रही क्योंकि उत्पादन बढ़ता रहा। देश में हरित क्रांति के असर के कारण अनाज के गोदाम भरे रहे और कीमतें स्वाभाविक महंगाई के साथ लगभग अनुकूल स्तर पर बनी रहीं। परंतु, 2004 से खाद्य पदाथरे की कीमतें भारत समेत पूरी दुनिया में तेजी से बढ़ने लगीं। इस दौरान कीमतों में लगभग 240 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई जो किसी पैमाने से तर्कसंगत नहीं कही जा सकती। इस उछाल से दुनिया की आबादी का एक बड़ा हिस्सा भुखमरी की गिरफ्त में आ गया। लगभग 20 देशों में अनाज की कमी ने कलह की स्थिति बना दी। वि बैंक के अनुसार 2010-11 में खाद्य कीमतों में बढ़ोतरी के कारण दुनिया के सात करोड़ से ज्यादा लोग भयंकर गरीबी का शिकार हो गये। दरअसल, किसी भी देश में अनाज उपलब्ध होना और अनाज तक गरीबों की पहुंच होना, दो अलग-अलग बातें हैं। अंतरराष्ट्रीय अनुमान है कि अगर किसी व्यक्ति की आय 1.25 अमेरिकी डॉलर (लगभग 60 रुपये) प्रतिदिन से कम हो तो अनाज की कीमतें बढ़ने पर उसे केवल एक समय का भोजन नसीब होगा। एक अनुमान है कि दुनिया के एक अरब से ज्यादा लोगों की आमदनी एक डॉलर प्रतिदिन से कम है और 80 करोड़ लोग भूख का शिकार हैं। दूसरी ओर अपने देश में कुछ दिन पहले ही सरकारी स्तर पर कहा गया कि 32 रुपये हर रोज कमाने वाला व्यक्ति गरीब नहीं है। हालांकि, इसका विरोध होने पर इस परिभाषा को वापस ले लिया गया। बहरहाल, देश में भुखमरी बढ़ती जा रही है। कृषि निवेशों की कीमत बढ़ने के कारण कृषि उत्पादों की लागत अपने-आप बढ़ जाती है। यही वजह है कि सरकार हर साल अनाज के समर्थन मूल्य में बढ़ोतरी कर देती है। इससे भी अनाज की कीमतें बढ़ती हैं और गरीब की थाली कुछ और सिकुड़ जाती है। अंतरराष्ट्रीय खाद्य नीति अनुसंधान संस्थान (इफप्री) द्वारा जारी ताजा रिपोर्ट में बताया गया है कि भारत में खाद्य सुरक्षा खतरनाक स्तर पर है। संस्थान ने दुनिया के 81 विकासशील और गरीब देशों में अध्ययन कर वैिक भूख सूचकांक (ग्लोबल हंगर इंडैक्स) का आकलन किया जिसमें हमारा देश 67वें स्थान पर रहा, दुनिया के केवल 14 देश ही हमसे पीछे हैं। पाकिस्तान, नेपाल, रवांडा और सूडान जैसे देश भी इस कतार में हमसे आगे नजर आते हैं। रिपोर्ट कहती है कि पिछले दस सालों में देश में खाद्य सुरक्षा की स्थिति में विशेष सुधार नहीं हुआ। देश में गरीबी और अनाज की बढ़ती कीमतों के मद्देनजर खाद्य सुरक्षा कानून लागू किये जाने की योजना है। इसके तहत प्रत्येक परिवार को 35 किलोग्राम अनाज देने का प्रस्ताव है। इस कानून में गरीबी की रेखा से नीचे और ऊपर गुजर करने वाले लोगों के लिए अलग-अलग प्रावधान हैं। सरकार कहती है कि इसे शीत सत्र में प्रस्तुत किया जाएगा। गरीब की भूख से जुड़े मसलों का राजनीतिकरण गंभीर चिंता उत्पन्न कर रहा है, क्योंकि भूख तुरंत निदान चाहती है। दुनिया में जहां भी सरकार ने गंभीरता से भुखमरी खत्म करना चाही, वहां कामयाबी मिली। मैक्सिको में 2008 में खाद्य कीमतों में उछाल आया तो सरकार ने गरीबों को नकद सहायता देनी शुरू कर दी। लेकिन शर्त थी कि बच्चे स्कूल जाएं और परिवार के सदस्य स्वास्थ्य केंद्रों में नियमित जांच करायें। इससे खाद्य सुरक्षा के साथ ही पोषण और स्वास्थ्य सुरक्षा भी हुई और शिक्षा का स्तर भी सुधरा। अपने यहां ऐसा कदम उठाने से पहले हमें तमाम मुश्किल और अप्रिय सवालों से जूझना होगा। खाद्य कीमतें बढ़ाने का दोष आमतौर पर बढ़ती आबादी के सिर मढ़ दिया जाता है, परन्तु अपने देश के संदर्भ में इसमें ज्यादा सचाई नहीं दिखाई नहीं देती क्योंकि आबादी के साथ खाद्यान्न उत्पादन में लगातार बढ़ोतरी दर्ज की गई। 1950-51 में महज पांच करोड़ टन से शुरू हुई यह यात्रा अब लगभग 24 करोड़ टन का आंकड़ा पार कर चुकी है। 2020 में देश को 28 करोड़ टन अनाज की जरूरत पड़ेगी जिसे पूरा करने के लिए देश के किसानों और कृषि वैज्ञानिकों, दोनों ने ही पूरी तैयारी कर रखी है। हमारे अनाज के गोदाम भरे पड़े हैं पर समस्या यह है कि अनाज के सुरक्षित भंडारण के लिए जगह की कमी है। आये दिन अनाज सड़ने की खबरें आती हैं। उच्चतम न्यायालय ने दखल देते हुए निर्देश दिया था कि अनाज को सड़ने के लिए छोड़ देने की बजाय गरीबों में बांट दिया जाए। दरअसल समस्या आबादी बढ़ने की नहीं बल्कि अनाज खरीदने की आर्थिक सामथ्र्य न होने की है। गरीबी और भुखमरी के बीच चोली-दामन का रिश्ता है। इस सिलसिले में मनरेगा से काफी आशाएं बंधी हैं क्योंकि इससे ग्रामीणों की आमदनी में इजाफा हुआ है और शहरी पलायन में कुछ हद तक कमी देखने में आई है। परंतु व्यापक गरीबी और अधिनियम की सीमाओं के मद्देनजर इस कार्यक्रम का अपेक्षित असर कम ही दिखाई दे रहा है। आज जरूरत इस बात की है कि खासतौर से ग्रामीण क्षेत्रों में आमदनी बढ़ाने के लिए समग्र कार्यक्रम विकसित कर लागू किये जाए। दरअसल, खेती से होने वाली आमदनी में गिरावट आती जा रही है जिससे गांवों में गरीबी और भुखमरी का जोर बढ़ता जा रहा है। जोत का आकार घटने के साथ आमदनी भी घटती गई है। यही वजह है कि खेती में खुद किसानों की दिलचस्पी कम होती जा रही है। राष्ट्रीय स्तर पर किया गया सव्रेक्षण बताता है कि देश के 40 प्रतिशत किसान खेती का ‘धंधा’ छोड़ने के लिए तैयार बैठे हैं। हाल में गांवों में भूमि अधिग्रहण के मामले को लेकर उठे विवाद में भी ज्यादातर किसानों की दिलचस्पी कृषि भूमि अधिग्रहण से मिलने वाले आकषर्क मुआवजे में थी। कृषि में घटती दिलचस्पी के कारण ही देश के सकल घरेलू उत्पाद में कृषि का योगदान घटकर लगभग 15 प्रतिशत के आसपास रह गया है, जो 1990-91 में 30 प्रतिशत था। ग्रामीण क्षेत्रों में आमदनी बढ़ाकर गरीबों को भुखमरी से बचाने का एक ही रास्ता है- कृषि के साथ कुछ ऐसे घटकों को भी जोड़ा जाए कि कुल आमदनी में इजाफा हो। अपने देश में गरीबी और भुखमरी पर अंकुश लगाने के लिए हमें कृषि क्षेत्र को और अधिक मजबूत तथा आर्थिक रूप से आकषर्क बनाने की जरूरत है। वि खाद्य दिवस इस संकल्प को दोहराने का अवसर है।
Friday, October 14, 2011
गरीबी ही नहीं गैर-बराबरी भी है मुद्दा
योजना आयोग की शहरों में 32 और गांवों में 26 रुपये प्रतिदिन की गरीबी रेखा ने राष्ट्रीय जनमानस को झकझोर कर रख दिया है। इसके खिलाफ पूरे देश में हैरानी, गुस्से और प्रतिवाद के तीखे सुर सामने आए हैं। यह स्वाभाविक भी है। सवाल उठ रहे हैं कि क्या इतनी धनराशि में दो जून का भरपेट भोजन संभव है? खासकर हाल के वर्षो में जिस तरह से खाद्य वस्तुओं और जिंसों के अलावा बुनियादी जरूरत की सभी चीजों और सेवाओं की महंगाई आसमान छू रही है, उसके कारण आम आदमी का जीना दूभर होता जा रहा है। यही कारण है कि कई विश्लेषक इसे गरीबी नहीं, भुखमरी रेखा कह रहे हैं। इस हवाई गरीबी रेखा ने पूरे देश को इसलिए भी चौंकाया है क्योंकि गरीबी निरंतर असह्य होती जा रही है। इसकी वजह यह है कि देश के तेजी से बदलते आर्थिक-सामाजिक परिदृश्य में दिनोंदिन गरीबों का जीना मुहाल होता जा रहा है। पिछले डेढ़-दो दशकों में देश में जिस तरह से अमीरों और गरीबों के बीच खाई तेजी से बढ़ी और चौड़ी हुई है, उसके कारण गरीबी का दंश और गहरा और तीखा हुआ है। यह किसी से छुपा नहीं है कि देश में एक ओर अरबपतियों की संख्या और उनकी दौलत में लगातार बढ़ोत्तरी हो रही है, वहीं दूसरी ओर, गरीबों की हालत बद से बदतर होती जा रही है। असल में, पिछले कुछ दशकों खासकर नव उदारवादी आर्थिक सुधारों के बाद के दो दशकों में देश में जिस तरह से आर्थिक गैर-बराबरी और विषमता बढ़ी है, उसके कारण गरीबी अधिक चुभने लगी है। सत्तर और कुछ हद तक अस्सी के दशक के शुरुआती वर्षो तक देश में गरीबी और अमीरी के बीच इतना गहरा और तीखा फर्क नहीं दिखाई देता था, जितना आज दिखने लगा है। इसकी एक बड़ी वजह यह भी है कि पिछले डेढ़-दो दशकों में पारंपरिक अमीरों के अलावा नई आर्थिक नीतियों का फायदा उठाकर एक नया दौलतिया वर्ग पैदा हुआ है जिसकी अमीरी और उसके खुले प्रदर्शन ने गरीबों और निम्न मध्यम वगरे में गहरी वंचना का अहसास भर दिया है। इसमें कोई शक नहीं है कि नव उदारवादी आर्थिक नीतियों के कारण अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर में तेजी आई है। वह दो से तीन फीसद के हिंदू वृद्धि दर के दौर से बाहर निकलकर सात से नौ फीसद रफ्तार वाले हाई-वे पर पहुंच गई है। इसके साथ देश में बड़े पैमाने पर सम्पदा और समृद्धि भी पैदा हुई है। लेकिन यह भी एक कड़वी सचाई है कि यह समृद्धि कु छ हाथों में ही सिमटकर रह गई है। इसका समान और न्यायपूर्ण बंटवारा नहीं हुआ है। नतीजा यह हुआ है कि इस दौर में जहां अमीरों और उच्च मध्यवर्ग की संपत्ति और समृद्धि में तेजी से इजाफा हुआ है, वहीं गरीबों तथा हाशिये पर पड़े लोगों की स्थिति और खराब हुई है। सच तो यह है कि पिछले एक दशक में अमीरी अश्लीलता की हद तक और गरीबी अमानवीयता की हद तक पहुंच गई है। इसे देखने के लिए दूर जाने की जरूरत नहीं है। देश के बड़े महानगरों और शहरों के शापिंग मॉल्स में चले जाइए, वहां देश-दुनिया के बड़े ब्रांडों के उपभोक्ता सामानों की मौजूदगी और उनकी चमक-दमक आंखें चौंधियाने के लिए काफी है। आज देश में दुनिया के सबसे बड़े लक्जरी ब्रांड्स और उनके उत्पाद मौजूद हैं और अच्छा कारोबार भी कर रहे हैं। उनके कारण आज लंदन-पेरिस-न्यूयार्क और दिल्ली-मुंबई-बेंगलूरू में कोई खास फर्क नहीं रह गया है। दरअसल, भारत के अमीरों तथा उच्च मध्यवर्ग के उपभोग स्तर और दुनिया के अन्य मुल्कों के अमीरों के उपभोग स्तर में खास फर्क नहीं रह गया है। आज देश में बड़े अंतरराष्ट्रीय ब्रांडों की लाखों- करोड़ों की घड़ियां, कारें, ज्वेलरी, सूट, फोन सहित भांति-भांति के इलेक्ट्रॉनिक साजो-सामान, यहां तक कि खाने-पीने की चीजें भी उपलब्ध हैं। जाहिर है कि इनके उपभोगकर्ताओं की संख्या और उनके उपभोग की भूख दोनों बढ़ी हैं। सबसे बड़ी बात कि यह सब अब दबे-छिपे नहीं बल्कि खुलकर और सबको दिखाकर हो रहा है। इस वास्तविकता के उल्लेख का अर्थ सिर्फ इतना है कि जिस देश में कोई 78 फीसद से अधिक लोग 20 रुपये प्रतिदिन से कम पर गुजर-बसर करने के लिए अभिशप्त हों, वहां अमीरी की यह तड़क-भड़क और उसका खुला प्रदर्शन सामाजिक-आर्थिक अश्लीलता नहीं तो और क्या है? देश में बढ़ती आर्थिक गैर-बराबरी और विषमता का अंदाजा इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि सबसे अमीर दस फीसद लोग देश के कुल उपभोग व्यय का 31 फीसद गड़प कर जाते हैं। सबसे अमीर और उच्च मध्यवर्ग के 20 फीसद लोग कु ल उपभोग व्यय का 45 फीसद चट कर जाते हैं। जबकि सबसे गरीब दस फीसद लोगों के हिस्से कुल उपभोग का मात्र 3.6 फीसद हिस्सा आता है। यहां तक कि खुद प्रधानमंत्री को कुछ साल पहले उद्योगपतियों के सम्मेलन में कहना पड़ा था कि इस तरह के ‘दिखावे का उपभोग’ समाज के लिए अच्छा नहीं है और इससे बचा जाना चाहिए। यह और बात है कि सरकार की आर्थिक नीतियों के कारण ही यह सामाजिक-आर्थिक अश्लीलता सफलता का पैमाना बनती जा रही है। यही नहीं, इस दौर में आजादी के आंदोलन के दौर में बने सादगी, संतोष और मितव्ययता जैसे सामाजिक-राजनीतिक मूल्य लगातार बेमानी होते चले गए हैं। नए मूल्य यह हैं- ‘ग्रीड इज गुड’ यानी लालच अच्छी बला है, मोक्ष का रास्ता अधिकाधिक उपभोग और कर्ज लेकर घी पीएं। आश्चर्य नहीं कि पिछले डेढ़-दो दशकों में समावेशी विकास के नारों के बीच देश में गैर-बराबरी बेतहाशा बढ़ी है। तथ्य यह है कि अगर आज इस देश में नरेगा के तहत मिलनेवाली न्यूनतम मजदूरी सौ रुपये प्रतिदिन (मासिक तीन हजार रुपये) और कॉरपोरेट क्षेत्र के अधिकांश सीईओ की दस लाख से एक करोड़ रुपये मासिक की तनख्वाह को आधार मानें तो देश में आय के स्तर पर गैर-बराबरी बढ़ते-बढ़ते असह्य स्तर से भी ऊपर पहुंच गई है। भारत सरकार के सबसे आला अधिकारियों यानी सचिवों की मासिक तनख्वाह और नरेगा की मासिक मजदूरी के बीच 500:1 का अनुपात बढ़ती आर्थिक गैर बराबरी का बड़ा उदाहरण है। देश में योजना की शुरु आत में 10:1 के आर्थिक गैर बराबरी अनुपात को कु छ हद तक बर्दाश्त लायक माना गया था, लेकिन आय और उपभोग के स्तर पर मौजूदा गैर-बराबरी को देख लगता है कि यह किसी सतयुग की बात है। गौरतलब यह भी है कि इस दौर में तेज आर्थिक विकास के बावजूद रोजगार के अवसर तो बढ़े नहीं, अलबत्ता उसकी गुणवत्ता में गिरावट ही आई है। देश में अब भी कुल श्रम शक्ति का 92 फीसद हिस्सा असंगठित क्षेत्र में काम करने के लिए बाध्य है। यही नहीं, इस दौर में सीईओ से लेकर सरकारी नौकरशाहों की तनख्वाहों में भारी इजाफा हुआ है लेकिन न्यूनतम मजदूरी गरीबी रेखा की तरह अतीत में अटकी हुई है। निजी क्षेत्र का तेजी से विस्तार हुआ है लेकिन उसमें रोजगार के संविदाकरण और अस्थाईकरण के अलावा श्रम कानूनों का उल्लंघन बढ़ा है। दूसरी ओर कृषि क्षेत्र पर आबादी के 60 प्रतिशत की निर्भरता के बावजूद कु ल जीडीपी में उसका हिस्सा मात्र 14 फीसद रह गया है। मतलब 60 फीसद आबादी को देश की कुल आय में सिर्फ 14 फीसद हिस्सा मिल रहा है। कहने की जरूरत नहीं कि इस सबके कारण गैर-बराबरी बढ़ती जा रही है और बर्दाश्त से बाहर होती जा रही है। योजना आयोग की गरीबी (गल्प) रेखा इसीलिए और बेमानी लगने लगी है।
Tuesday, October 11, 2011
लोकपाल पर चर्चा के आडियो टेप जारी
सरकार ने लोकपाल विधेयक का मसौदा तैयार करने के लिए बनी संयुक्त समिति की बैठकों के नौ ऑडियो टेप सोमवार को जारी कर दिए। इन टेप के जरिए टीम अन्ना और पांच केंद्रीय मंत्रियों के बीच प्रस्तावित भ्रष्टाचार निरोधक कानून के दायरे में प्रधानमंत्री और न्यायपालिका को रखने जैसे विभिन्न प्रावधानों को लेकर तीखे मतभेदों की बात जाहिर होती है। ये टेप आरटीआइ कार्यकर्ता सुभाष अग्रवाल को एक सीडी के जरिए मुहैया कराए गए हैं। बातचीत के एक अंश में मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल को यह कहते सुना जा सकता है कि किसी मामले में प्रधानमंत्री के दोषी होने की बात जांच पूरी होने के बाद ही साबित हो पाएगी लेकिन जांच के दौरान उनके अंतरराष्ट्रीय रुतबे और जनता की नजर में उनके ओहदे के बारे में भी विचार किया जाना चाहिए। उन्होंने सुझाव दिया कि प्रधानमंत्री को अपना कार्यकाल पूरा करने दिया जाए और उनके खिलाफ कोई भी जांच या अभियोजन उनके पदमुक्त होने के बाद ही हो। सिब्बल की इस बात का टीम अन्ना के सदस्य और कर्नाटक के तत्कालीन लोकायुक्त संतोष हेगड़े ने कड़ा विरोध किया और कहा, प्रधानमंत्री, उच्च न्यायपालिका और निचली नौकरशाही को बाहर रखने से भ्रष्टाचार निरोधी निकाय के पास काम करने लायक कोई क्षेत्र नहीं बचेगा। वकील प्रशांत भूषण ने कहा, न तो संविधान और न ही किसी कानून के तहत प्रधानमंत्री को रियायत प्राप्त है। भूषण ने बैठकों के दौरान कहा, अगर मामला बनता है तो जांच होगी। वर्तमान में भी सीबीआई जांच कर सकती है लेकिन व्यावहारिक रूप से ऐसा नहीं हो पाता और ऐसा नहीं किया जाता। ऑडियो टेप के अनुसार, बातचीत में केंद्रीय मंत्री सलमान खुर्शीद को हजारे पक्ष के सदस्यों से लोकपाल को अभियोजन के अधिकार दिए जाने के बारे में सवाल करते सुना गया है। वह सवाल कर रहे हैं कि अभियोजन की मंजूरी लोकपाल की पीठ देगी या जांच अधिकारी। खुर्शीद ने कहा, अगर ऐसा लोकपाल की पीठ करेगी तो यह एक अलग बात है। अगर ऐसा अधिकारी करेंगे तो यह अलग होगा। तो अभियोजन शुरू कौन करेगा? आरटीआई कार्यकर्ता अरविंद केजरीवाल ने जवाब दिया शुरुआत में हमने मंत्रिपरिषद, न्यायाधीशों, प्रधानमंत्री और संसद सदस्यों के बारे में यह कहा है कि अभियोजन की मंजूरी लोकपाल की पीठ देगी। यह लोकपाल की सात सदस्यीय पूर्ण पीठ होगी, लेकिन अन्य के लिए लोकपाल किसी एक अधिकारी से मंजूरी देने को कह सकेगा। इस पर सिब्बल ने सवाल किया, नौकरशाही काम नहीं कर पाएगी। आपको किसी न किसी तरह से अधिकारियों का संरक्षण करना होगा। टेप में हेगड़े को भ्रष्टाचार निरोधी कानून के प्रावधानों और उच्चतम न्यायालय के फैसलों का हवाला देते हुए यह कहते सुना जा सकता है कि अभियोजन की मंजूरी देने वाला प्राधिकार यह देख सकता है कि क्या अपराध कर्तव्य निर्वहन के दौरान हुआ है। इस पर सिब्बल ने कहा,बुनियादी रूप से समस्या यही है कि हम यहां इस बात पर चर्चा नहीं कर रहे हैं। हम एक ऐसी समानांतर एजेंसी बनाने जा रहे हैं जो किसी के प्रति भी जवाबदेह नहीं रहेगी। टेप में वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी को यह कहते सुना जा सकता है, मैं चर्चा के लिए दोनों ही मसौदे पेश करूंगा, विचार के लिए नहीं। विचार संसद में ही होगा। सरकार को उसे पेश करने के लिए मंजूरी देने से पहले उस पर गौर करना होगा। इस पर केजरीवाल ने कहा, कैबिनेट इनमें से एक को चुनेगी। मुखर्जी ने कहा, या फिर दोनों के मिश्रण को।
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