समाज विभांशु दिव्याल
, आहत है। इसलिए नहीं है कि राज्य में आये
दिन बलात्कार हो रहे हैं, बल्कि
इसलिए है कि लगातार हो रहे बलात्कारों
की घटनाएं मीडिया में सुर्खियां बना रही हैं। मीडिया में
हल्ला होता है और हरियाणा स्वयं को अपमानित-आहत महसूस करता है। वह कभी उपचार
खोजता है, कभी सफाई
देता है और कभी गुस्से में पलटवार करता है। उसकी एक खाप पंचायत फरमान जारी
करती है कि लड़कियों की शादी पंद्रह वर्ष की उम्र में कर दी जाए, जैसे कि मुगलकाल में हिंदू परिवार लड़कियों
को अपहरण आदि से बचाने के लिए उनकी
शादी बचपन में ही कर दिया करते थे। हरियाणा के एक पूर्व
मुख्यमंत्री पंचायत के इस फरमान पर अपने समर्थन की मुहर लगा देते हैं। एक आहत
सरकारी प्रवक्ता बाकायदा
मीडिया के सामने अपना तर्क प्रस्तुत करते हैं कि नब्बे प्रतिशत मामलों
में लड़कियां बलात्कार स्थल या स्थिति तक अपनी सहमति से ही पहुंचती हैं
और गुंडों की गिरफ्त में फंस जाती हैं। एक और महिला मंत्री कहती हैं कि बलात्कार
हर जगह हो रहे हैं, फिर
हरियाणा को ही क्यों बदनाम किया जा रहा
है। मतलब, हरियाणा में हो रहे बलात्कार कोई ऐसी परिघटना नहीं हैं कि
इन्हें बेवजह
तूल दिया जाए। एक तेजतर्रार महिला कांग्रेस प्रवक्ता बयान देती हैं कि
बलात्कार की घटनाएं कानून- व्यवस्था की समस्या नहीं है, बल्कि किसी और वजह से हैं। किस वजह से है, इसकी व्याख्या नहीं दी गई। बलात्कार
की घटनाओं पर
भद्रजनों की ऐसी असंवेदनशील प्रतिक्रियाएं देश के साठोत्तरी संविधान के मुंह
पर तमाचा प्रतीत हो सकती हैं; प्रगतिकामी चेतना के लोगों को सोलहवीं सदी की मानसिकता की उपज लग सकती हैं; औरतों की बराबरी और उनके संवैधानिक अधिकारों
के पैरोकारों को गुस्से से भर सकती हैं;
मीडिया के विचारवानों को उत्तेजित कर सकती हैं और स्वयं
आधुनिकतावादी महिलाओं को गुस्से से भर सकती हैं। मगर खाप पंचायतों के फैसले और
स्वयं संवैधानिक व्यवस्थाओं का बलात्कार
करने वाली प्रतिक्रियाएं इस समय के एक बेहद अभद्र सामाजिक सच
को भी उजागर कर
रहे हैं। यह वह सच है जो महिलाओं को सुरक्षा देने में कानून-व्यवस्था की असफलता, राजनीतिक जमात की असंवेदनशीलता और
सत्ता की चाह में किसी भी
दुष्प्रवृत्ति के आगे घुटने टेक देने की लोकतांत्रिक
प्रवृत्ति, खाप पंचायतों
की जैसी कुलक जाहिल मानसिकता, सामाजिक-आर्थिक निर्णायक ताकतों की पुरुषवादी और रुढ़िवादी वैचारिकता और
आधुनिक विचारवाहकों के आम जनता के
दिमाग तक पहुंचने के प्रयासों की विफलता जैसे तत्वों से तैयार
हुआ है। इस सच
से आंखें तो चुराई जा सकती हैं, इसकी बयानी निंदा भी की जा सकती है; लेकिन इससे बचकर नहीं भागा जा सकता।
किसी भी सामाजिक दुष्प्रवृत्ति पर चंद
पढ़े-लिखे लोगों द्वारा विचार किया जाना और उसके विरुद्ध
कानून बना दिया जाना
एक बात है, लेकिन
उस कानून के प्रति लोगों में आस्था जगाना,
ऐसा
वातावरण निर्मित करना जिससे लोग उस कानून का पालन कर सकें और
कानून तोड़ने वालों
के विरुद्ध सामाजिक तौर पर सक्रिय हो सकें,
एकदम दूसरी बात। अगर एक खाप पंचायत और एक पूर्व मुख्यमंत्री
लड़की की शादी बचपन में ही करने की बात
करते हैं, तो समझना चाहिए कि सामाजिक स्थिति कितनी गंभीर है। खाप
पंचायत यह
फरमान भी जारी कर सकती थी कि जो भी व्यक्ति किसी लड़की की इज्जत पर हाथ डालेगा
उसे समूचा समाज मिलकर कानून के कटघरे में पहुंचाएगा और जो भी लोग उसका
बचाव करेंगे उनका बहिष्कार किया जाएगा। अगर यह फरमान जारी होता तो स्थिति
एकदम अलग होती और बेधड़क विचरण करने वाली बलात्कारी मानसिकता भयभीत होती।
मगर ऐसा फरमान जारी करने के लिए एक खाप पंचायत का पुरुषवादी सोच से बाहर
निकलकर आधुनिकतावादी सोच में दीक्षित होना जरूरी है। यही वह काम है जो हमारा
लोकतंत्र साठ-सत्तर वर्षो में भी नहीं कर पाया है। उल्टे सारी चुनावी
राजनीति ने, सिर्फ
हरियाणा में ही नहीं बल्कि समूचे देश में,
वोट की
खातिर खाप मानसिकता के आगे सिर झुका दिया है, उससे समझौता कर लिया है। खाप मानसिकता
और चुनावी राजनीति के घालमेल ने जो वातावरण तैयार किया है वह उसी तरह
से एक बलात्कारी के पक्ष में जाता है,
जिस तरह से एक भ्रष्टाचारी के पक्ष में। अगर कोई सर्वाधिक असुरक्षित
है तो वह है अपने संविधान प्रदत्त
अधिकारों के साथ जीने की चाह रखने वाली औरत और अपनी मेहनत के
साथ ईमानदारी से
जीने की चाह रखने वाला आदमी। चुनावी राजनीति और खाप मानसिकता के घालमेल ने
उस समूची मूल्यव्यवस्था को भी ढहा दिया है जो कभी प्रगतिगामी, अग्रगामी प्रतीत होती थी। अब लगता है जैसे समाज
पुन: आदिम युग की ओर लौट चला है,
जिसमें नैतिकता नहीं बल्कि पशुबल वर्चस्व स्थापित रहता था।
एक बर्बर आदिम समाज
ही औरतों, लड़कियों, बच्चियों के नाम यह फरमान जारी करता
है कि तुम्हें
बलात्कार से बचाने की जिम्मेदारी राज्य की नहीं है, महावीर पंचायत पुरुषों की नहीं है, बल्कि तुम्हारी अपनी है। अगर बलात्कार
से बचना है तो खेलने-पढ़ने
की उम्र में शादी कर लो, घर
से बाहर मत निकलो, मोबाइल
हाथ में मत
लो और लड़कों से दोस्ती तो हरगिज मत रखो। परदे में रहो और अपने विरुद्ध हो
रहे हर अपराध पर पर्दा डालती रहो। सुनो लड़कियों,
इस लोकतंत्र की यही
नसीहत है तुम्हें।
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Rashtirya Sahara National Edition 14-10-2012 PeJ -10 लोकतंत्र
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