लोकतंत्र एक ढीली-ढाली व्यवस्था है, लेकिन इसकी उपलब्धियों के आगे तानाशाहियों का तेज फीका पड़ जाता है। दुनिया के पिछले
दो सौ सालों के इतिहास का यह
स्पष्ट निर्णय है। पहली नजर में यह बात अजीब सी लगती है कि राजनीतिक दांव-पेंचों की वजह से लस्त-पस्त और लचर हुई
लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं ने
उपलब्धियों के लगभग हर मानदंड पर तानाशाहियों को बहुत पीछे छोड़ दिया है। पूरी दुनिया पर जिस अमेरिका और पश्चिमी
यूरोप का वर्चस्व है वहां लोकतंत्र है
और विकास का प्रकाश भी है। पिछली शताब्दी में बीच-बीच में कभी जापान, साम्यवादी सोवियत संघ और फासीवादी जर्मनी का दबदबा जरूर बढ़ा, लेकिन इनमें से किसी भी किस्म की तानाशाही अपने देश को
स्थायी रूप से समृद्ध नहीं बना
सकी। तानाशाहियों के महल एक झटके में ही जमींदोज हो गए। दूसरी ओर जनतांत्रिक देश धीमी गति से ही सही, लेकिन मजबूती के साथ आगे बढ़ते रहे। जागरण फोरम के छठवें कान्क्लेव के विमर्श का विषय यही है।
यक्ष प्रश्न यह है कि आखिर
लोकतंत्र में ऐसा क्या है, जो उसे राजतंत्र, धर्मतंत्र, कुलीनतंत्र, सैनिकतंत्र और
साम्यवादी अधिनायकतंत्र से हर हिसाब से सफल सिद्ध करता है? इस बहस का एक व्यावहारिक पहलू भी है। लोकतंत्र से कई बार गंभीर नागरिक भी इतने हताश हो जाते हैं कि उनको लोकतंत्र
से ही अरुचि पैदा हो जाती है। पहले
बुजुर्ग लोग अक्सर कहते मिल जाते थे कि इससे अच्छी तो अंग्रेजों की हुकूमत थी या देश की बुराइयों को दूर करने
के लिए सैनिक शासन की जरूरत है।
लोकतंत्र की ऐसी ही कुछ कमजोरियों के कारण ऐसे आंदोलनों और संगठनों को भी शक्ति मिलती है जो लोकतंत्र की आजादी का
दुरुपयोग करके लोकतंत्र की ही
हत्या करना चाहते हैं। यह सही समय है जब हम खतरे की इस घंटी को सुनें और इससे निपटने का रास्ता ढूंढें। सच्चाई यह है
कि लोकतंत्र का विकल्प और अधिक
लोकतंत्र ही हो सकता है। जागरण फोरम की बहस में यह बात और साफ हो जाएगी। हम देखेंगे कि लोकतंत्र न केवल एक
उत्कृष्ट मानवीय व्यवस्था है, बल्कि उससे
सर्वागीण और स्थायी विकास भी होता है। जनतंत्र में सर्वागीण और स्थायी विकास इसलिए संभव है, क्योंकि जनतंत्र में ही, बहुत कुछ वोटों
की प्रतिद्वंद्वात्मक राजनीति की मजबूरी की वजह से ही सही और बहुत धीमे-धीमे ही सही, लेकिन देर-सबेर हर वंचित वर्ग का सशक्तीकरण होता है। पूरे उत्तर भारत में इसी विवशता में पिछड़ी
जातियों का सशक्तीकरण हुआ, हालांकि इस अभियान को कभी गैर-कांग्रेसवाद, कभी लोहियावादी समाजवाद और कभी सामंतवाद-विरोधी कृषक वर्ग के गठबंधन का सैद्धांतिक
नाम दिया गया। फिर उत्तर प्रदेश में
जनतांत्रीकरण के इसी अभियान के अंतिम दौर में दलित वर्गो का सशक्तीकरण हुआ। देर-सबेर पूरे देश के बचे-खुचे निर्बल
वर्गों को स्वतंत्र एवं
सशक्त प्रतिनिधित्व प्राप्त होगा। जनतांत्रीकरण की इसी प्रक्रिया में विकास की कुंजी छिपी हुई है। जब सभी वर्गो
का सशक्तीकरण हो जाएगा तो फिर
धीरे-धीरे इन सभी वर्गो के विकास का रास्ता भी खुलेगा। शुरू में यह दिख सकता है कि किसी वर्ग का सशक्तीकरण तो हुआ, लेकिन उनका लाभ कुछ प्रभावशाली राजनीतिक परिवारों तक सिमट गया है और राजनीति
में जातिवाद का जहर अलग से घुल
गया है। ऐसा लंबे समय तक नहीं चल सकता। कुछ समय बाद हर वर्ग और हर क्षेत्र में विकास की मांग उठेगी। पूरी दुनिया की
लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में
ऐसा ही हुआ है और अभी तक भारत की राजनीतिक यात्रा भी इसी रास्ते से चली है। जागरण फोरम के इस कान्क्लेव को उत्तर प्रदेश की राजधानी
में आयोजित करने का निहितार्थ एकदम
साफ है। देश के सबसे अधिक जनसंख्या वाले प्रदेश की हैसियत से उत्तर प्रदेश लोकतंत्र और विकास के किसी भी राष्ट्रीय
विमर्श के केंद्र में ही रहेगा।
अभिजात्य अर्थशास्ति्रयों ने उत्तर प्रदेश को बीमारू और काऊबेल्ट का भाग बनाकर उपहास का पात्र बनाया था, लेकिन आज वे स्वयं इतिहास के कूड़ेदान में फेंक दिए गए हैं। पिछली योजनावधि में
उत्तर प्रदेश की विकास दर लक्ष्य
से ऊपर रही है। प्रदेश की अर्थव्यवस्था का देश में दूसरा स्थान है। अगर वर्तमान सरकार ने अपने संकल्प को साकार
करने की कोशिशें जारी रखीं तो उत्तर
प्रदेश को बहुत खामोशी से देश की पहले नंबर की अर्थव्यवस्था का दर्जा भी मिल सकता है। इस प्रदेश में बहुत ऐसे
सकारात्मक तत्व हैं, जिनको अनदेखा
किया गया है। विकास के संदर्भ में यह पूरे देश के लिए एक शुभ संकेत होगा। तेज विकास के लक्ष्य को पाने के लिए उत्तर प्रदेश पूरी तरह से
सक्षम है। प्रदेश की एक
विचित्र शक्ति यह है कि इसके सभी उप-क्षेत्रों की स्पष्ट पहचान जरूर है, इसके बाद भी पूरे प्रदेश में असाधारण प्रादेशिक समरसता है। पिछले चुनाव में तो खुद सरकारी दल ने प्रदेश के विभाजन
को मुद्दा बनाने का प्रयास किया था, लेकिन इसके बाद भी किसी भी क्षेत्र की जनता ने प्रदेश विभाजन की मांग का समर्थन नहीं किया। आश्चर्य का विषय यह
है कि उत्तर प्रदेश में कभी
भी राष्ट्रीय राजनीति को क्षेत्रीय राजनीति से अलग करके नहीं देखा गया। उत्तर प्रदेश को इस राष्ट्रवादी भावना के
कारण नुकसान भी सहना पड़ा। उत्तर प्रदेश की लोकतांत्रिक संस्कृति में सर्वागीण
विकास के सूत्र छिपे हैं, लेकिन इन पर अधिक ध्यान नहीं दिया गया है। यह प्रदेश
स्वतंत्रता मिलने के बाद जमींदारी
उन्मूलन के मामले में सबसे आगे रहा है। पूरे देश में यह अकेला प्रदेश है, जहां दलित नेतृत्व के किसी दल को स्पष्ट बहुमत मिला। यहां सांप्रदायिक प्रभाव की बात की जाती है, लेकिन इस पक्ष पर कम ध्यान दिया गया कि प्रदेश के इतिहास में सर्वाधिक मुस्लिम विधायक (68) होने के बाद भी कहीं कोई सांप्रदायिक प्रतिक्रिया नहीं दिखाई देती है। प्रदेश
की जनता ने हर संकट के समय
स्वस्थ राजनीतिक संकल्प का परिचय दिया है। 1989, 1991, 1993 और 1996 में
अस्थिर विधानसभाओं के अनुभव से सीखकर इसी मतदाता ने पिछले दो बार से एक दल को पूर्ण बहुमत दिया है। इन बातों का आशय
यह है कि प्रदेश की जनता में और
वर्तमान शासन में राजनीतिक परिपक्वता है। दोनों स्तरों पर विकास की इच्छा दिखती है। उत्तर प्रदेश के विकास से लोकतंत्र और विकास की
सैद्धांतिक मान्यता को ठोस व्यवहारिक रूप मिल सकता है। इस संदर्भ में सत्तारूढ़ दल के
विकास के विचार की प्रशंसा भी
होनी चाहिए। इस विकास का दायरा व्यापक है और इसका चेहरा मानवीय है। इसी समझ के कारण प्रदेश सरकार ने कल्याणकारी
कार्यक्रमों के क्रियान्वयन पर
भी जोर दिया है। प्रदेश को इन कार्यक्रमों के लिए पर्याप्त संसाधन जुटाने होंगे। इसके अतिरिक्त शासन को कृषि की
उत्पादकता बढ़ाने पर और पूर्वांचल के
आर्थिक पिछड़ेपन को समाप्त करने पर विशेष जोर देना होगा। सर्वागीण विकास के सपने को साकार करने के लिए आवश्यक है
कि उत्तर प्रदेश मानवीय विकास
सूचकांक के कई संकेतकों को सुधारने के लिए विशेष प्रयास करे। उत्तर प्रदेश का विकास भारतीय लोकतंत्र के आधार को अधिक
मजबूत बनाएगा। (लेखक दैनिक जागरण
के राजनीतिक संपादक हैं)
Dainik Jagran National
Edition, 13-10-2012 लोकतंत्र PeJ-8
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