Tuesday, October 2, 2012

सच्चे लोकतंत्र का संकल्प





हिन्द स्वराज सुरेंद्र कुमार
आजादी के बाद भारतवासियों में आशा का वातावरण बना था कि देश बदलेगा। लेकिन निर्मम सत्ता और निर्लज्ज राजनीति आमजन की अपेक्षाओं को रौंदती रही। यह निर्विवाद है कि औपनिवेशिक शासन के दौरान अंग्रेजों ने इस देश का भरपूर दोहन किया। ब्रिटिश राज में बनायी गयी नीतियों से सर्वाधिक लाभ पूंजीपतियों को ही मिला। कृषि प्रधान देश में कृषि की सर्वाधिक उपेक्षा हुई। खेती किसानी ही नही, यहां के उद्योग-धंधे, हस्तकला, करघा उद्योग और पारम्परिक ज्ञान-विज्ञान के प्रति भी अंग्रेजों की वही नीति रही जिसने इन्हें बर्बाद करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। उनकी इन नीतियों ने आज भी हमें गुलाम बना रखा है। आज भी भारतीय मानस में बैठा है कि पश्चिम का विज्ञान, शिक्षा, उद्योग-धंधे और उत्पादन के माध्यम ही श्रेष्ठ हैं। हम लोगों ने आजादी के आंदोलन के दौरान जहां स्वावलंबन का नारा दिया था, वहीं आज हम पूरी तरह से हर बात के लिए पश्चिम की ओर टकटकी लगाये दिखते हैं। यहां तक की खान-पान, रहन-सहन, सभ्यता संस्कृति और भाषा के मामले में भी आजाद नहीं दिखते। आज स्थिति इतनी भयावह हो चुकी है कि बहुराष्ट्रीय कंपनियां सिर्फ व्यापार नहीं करती बल्कि व्यापार के लिए सत्ता और सरकार का भी संचालन करती हैं। ये विभिन्न देशों की प्रभुसत्ता संचालकों के चयन का भी काम करती हैं। ऐसी शक्तियों से संघर्ष के लिए जिस राजनीति को संघर्ष करना था, वह अपना-अपना दाव निर्लज्जता से चल रही हैं इसलिए भ्रष्टाचार इनके लिए सर्व-स्वीकृत राजनीतिक मूल्य है। ऐसे में इन नेताओं के लिए स्वराज का सवाल कोई मायने नहीं रखता। लेकिन हमें तो स्वराज चाहिए। स्वराज का तात्पर्य सिर्फ देश के लोकतंत्र से नहीं है बल्कि विश्व नागरिक के व्यक्तिगत सुराज से है। महात्मा गांधी ने 1909 में लंदन से दक्षिण अफ्रीका लौटते हुए हिन्द-स्वराजनामक पुस्तक लिखी थी। सौ से भी अधिक साले पहले गांधीजी ने जो विचार प्रकट किया है, वह युगांतकारी है। हिन्द स्वराजका शताब्दी वर्ष मनाया जा चुका है परन्तु उसमें व्यक्त विचारों के कार्यान्वयन की दिशा में न के बराबर प्रयास हुआ है। गांधी ने स्वराज की परिभाषा अनोखे ढंग से की। उनके शब्दों मेंस्वराज को समझना जितना आसान लगता है उतना ही मुश्किल है। स्वराज के लिए सब अधीर हैं लेकिन वह क्या है? इस बारे में ठीक राय पर नही पहुंचे हैं। हम सब अंग्रेजों को बाहर निकालना चाहते हैं, लेकिन उनको क्यों निकालना चाहिए, इसका कोई ठीक ख्याल नही करता।
अपने संसदीय लोकतंत्र के परिप्रेक्ष्य में हिन्द स्वराज पर विचार करते समय आज के हालत पर विचार करना जरूरी प्रतीत होता है। आज लोकतंत्र का अभ्यास जनता को अलग-थलग करने, विभाजित करने यानी उसको खरीद- फरोख्त करने का दिखता है। हिन्द स्वराजमें स्पष्ट है कि संसद से गांधीजी को किसी प्रकार के सृजन या रचना की आशा नहीं थी। दूसरा वे मानते थे कि संसदीय पण्राली चरित्रहीनता और विवशता के साथ-साथ शौक पैदा करेगी और देश का भाव कतई नहीं रहेगा। वर्तमान चुनाव व्यवस्था में संसद से लेकर पंचायत तक की चुनाव पण्राली दूषित हो चुकी है। अच्छे, सृजनशील और संवेदनशील लोग लगातार राजनीति से किनारा कर रहे हैं। वर्तमान राजनीति के कारण देश की एकता-अखंडता पर खतरा उत्पन्न हो गया है। देश जातीय और साम्प्रदायिक तनाव की ओर बढ़ रहा है। आज देश में 84 करोड़ लोगों की आमदनी 20 रुपये प्रतिदिन है। 20 रुपये का आकड़ा भी तो प्रति व्यक्ति हिसाब का हिस्सा है जो सभी भारतवासियों की कुल आमदनी का हिस्सा है। सच तो यह है कि करोड़ो लोगों की आमदनी तो प्रतिदिन शून्य है। दूसरी तरफ हमें गौरव होता है कि हमारे परिजन दुनिया के दस शीर्ष धनवानों में हैं, अरबों की लागत से बने मकानों में रह रहे है जबकि लाखों गांवो में पीने का पानी उपलब्ध नहीं है, लोग भुखमरी का शिकार हो रहे हैं। अर्थात जीवन की बुनियादी जरूरतों, हवा, पानी, भोजन, घर, शिक्षा और चिकित्सा से वंचित लोगों को संसदीय पण्राली हवा दे रही है। नदियां नालों में बदल रही हैं। जंगल गायब होते जा रहे है। पानी, जंगल और जमीन बाजार के चंगुल में फंस चुके हैं। एक अदृश्य शक्ति बाजार के रूप में, एक सपना वैश्वीकरण युद्ध हमारा पुरुषार्थ हो गया है। जीवन का लक्ष्य खाओ-पीओ और मौज करो में समाहित हो गया है। इसमें से जो मनुष्य पैदा हो रहा है वह लोभी-लालची, कामी, कुंठित और क्रूर पैदा हो रहा है। उसकी राजनीति, उसकी व्यवस्था अगाध भोग की इच्छा से लैस है। लगता है वर्तमान लोकतंत्र मृगतृष्णा बनकर रह गया है। ये सभी कारक लोकतंत्र को निगलने वाले हैं। जीवन का उद्देश्य, उसकी प्रेरणा और उसके अनुसार तंत्र विकास को गांधीजी ने हिन्द स्वराजमें प्रस्तुत करने का प्रयास किया है। यह बीज रूप में है। हमें वैकल्पिक दुनिया की तलाश में बीज को पौधे के रूप में रूपांतरित करने का संकल्प लेना होगा। गांधी का हिन्द स्वराजलोकतंत्र की कामना करते समय उसकी बुनियाद में संवाद, सहयोग और समन्वय को स्वीकार करता है। अल्पमत पर बहुमत के शासन के बजाए सबके सम्मान की बात करता है। न्याय की बात करते समय पंचायत परम्परा को आधारभूत संरचना के रूप में देखता है। हिन्द स्वराजकरुणा में राज की वकालत करता है। आज हमारा लोकतंत्र लोक के बजाए बहुराष्ट्रीय कंपनियों से हाथ मिलाते बाजार की ताकत के सामने घुटने टेकता दिखता है। बार-बार व्यक्ति बदलने की बात होती है। व्यवस्था पर गंभीर विचार नहीं होता। तंत्र सरकार के रूप में, पक्ष और विपक्ष के रूप में, न्याय और मीडिया के रूप में, बाजार के रूप में एक ही प्रकार की नीयत और नीति प्रकट कर रहा है। यह थोड़े से लोगों का चित्त और चिंता है, चरित्र और चिंतन है। गांधी मानते थे कि अंग्रेज चले भी जाएं और अंग्रेजियत रह जाए तो हिन्दुस्तान को स्वराज हासिल नहीं होगा। उनका मानन था कि हमें छूट नही, छुटकारे की जरूरत है। किस बात का छुटकारा? एक ऐसी व्यवस्था से जो केन्द्रीकरण पर आधारित है। इसका विकल्प लोक भागीदारी वाला तंत्र निर्णय और विकास होगा। यह ग्राम स्वराज अथवा नगर स्वराज की कल्पना में दिखता है। इसे विस्तारित करना और प्रचारित करना आज की चुनौती है। आज गांधी जयंती के अवसर पर हिन्द स्वराजके संकल्प के साथ आगे बढ़कर देश में उसी के अनुरूप व्यवस्था खड़ा करने का संकल्प लेना होगा।


Rashtirya Sahara National Edition Democracy – Date-02-10-2012 Pej 10

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