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Saturday, February 5, 2011

माननीयों की कारगुजारियां ही करेंगी सरकार को शर्मसार


सड़क के बाद सदन में होगी शीलू और दिव्या कांड की गूंज
लखनऊ। सड़कों के बाद अब सदन में सरकार के मंत्रियों, विधायकों की कारगुजारियां और महिला उत्पीड़न की घटनाएं मायावती सरकार को शर्मशार करेंगी। यही विपक्ष का ब्रह्मास्त्र भी बनेंगी। भ्रष्टाचार और आपराधिक मामलों में नाम आने पर आधा दर्जन मंत्रियों के खिलाफ कार्रवाई और एक दर्जन विधायकों को जेल भेजने के बावजूद सरकार के मंत्री, विधायकों के इस तरह केआचरण में कोई कमी नहीं आई है।

सत्र में इस बार मायावती कैबिनेट के मेम्बरों की कारगुजारी, महिला और दलित उत्पीड़न की घटनाएं सरकार के कानून व्यवस्था के दावों पर सरकार को ही आइना दिखाने का काम करेंगी। अभी तक इन घटनाओं को लेकर विपक्षी दल सड़क से लेकर राजभवन तक ही अपना विरोध दर्ज कराकर सरकार की कथनी करनी उजागर करते रहे। जबकि कानून व्यवस्था के मुद्दे पर मुख्यमंत्री मायावती पिछली सरकारों के कार्यकाल में हुई घटनाओं को गिनाकर अपने को सबसे बेहतर सरकार साबित करने में लगी रहीं। लेकिन उनके दावे को उन्हीं के सरकार के मंत्री और विधायक मुंह चिढ़ा रहे हैं। आलम यह है कि महिला उत्पीड़न की घटनाओं में शामिल लोगों में माननीयों के भाई-भतीजे ही शामिल हैं। इलाहाबाद में बलात्कार की शिकार अगवा की गई लड़की को धमकाने का आरोपी उच्च शिक्षा मंत्री राकेशधर त्रिपाठी का भतीजा निकला और गाजियाबाद में कार में गैंगरैप की घटना को अंजाम देने वाला कोई और नहीं बल्कि कैबिनेट मंत्री राजपाल त्यागी का भतीजा ही था। कानपुर में एक वकील ने अपनी आत्महत्या के लिए स्वास्थ्यमंत्री अनंत कुमार मिश्र को जिम्मेदार ठहराया। इन मंत्रियों के खिलाफ कोई कार्रवाई तो दूर, इन सबको क्लीनचिट दे दी गई। इसी प्रकार बांदा में शीलू निषाद के उत्पीड़न की घटना में विपक्ष के काफी दबाव और उच्च न्यायालय के स्वत: संज्ञान लेने के बाद सरकार कार्रवाई करने को मजबूर हुई। सरकार के कानून व्यवस्था के दावों को सही साबित करने की जल्दी में पुलिस की भी पोल खुली। उसने आनन फानन में कहीं निर्दोष लोगों को जेल भेज दिया तो कहीं पीड़ित पक्ष को ही जेल में डाल दिया। मायावती सरकार की एकतरफा और द्वेषपूर्ण कार्रवाई की असलियत सीबीसीआईडी ने ही बताई। जिसके बाद बांदा के शीलू और कानपुर के दिव्या प्रकरण में कई पुलिस कर्मियों के खिलाफ निलंबन की कार्रवाई हुई। बांदा में पुलिस ने बलात्कार पीड़ित शीलू को ही जेल में डाल दिया तो कानपुर के दिव्या प्रकरण में पुलिस ने मुख्य आरोपी के बजाय निर्दोष को जेल भेज दिया था।सड़क के बाद सदन में होगी शीलू और दिव्या कांड की गूंज.

Friday, February 4, 2011

प्रशासनिक सुधार की खोखली बातें


हमारा देश 2-जी स्पेक्ट्रम, राष्ट्रमंडल, आदर्श सोसाइटी और कर्नाटक भूमि जैसे घोटलों में इस कदर उलझा हुआ है कि उन छोटी-छोटी बातों की तरफ किसी का ध्यान नहीं जा रहा, जो बड़े घोटालों का कारण बनती हैं। इसी तरह की एक छोटी-सी घटना है प्रसार भारती के मुख्य कार्यपालक अधिकारी (सीईओ) बीएस लाली को भारत के राष्ट्रपति द्वारा उनके पद से हटाया जाना। आरोप है कि उन्होंने राष्ट्रमंडल खेलों के प्रसारण का 246 करोड़ रुपये का ठेका ब्रिटेन की एसआइएस लाइव कंपनी को दिया। चूंकि इस घोटाले की जांच होनी है, इसलिए सरकार को उन्हें हटाना पड़ा। यह फैसला 22 दिसंबर, 2010 को लिया गया।शुंगलू जांच समिति ने इस सौदे में प्रथम दृष्टया गड़बड़ी पाई है। बीएस लाली उत्तर प्रदेश कैडर के 1971 बैच के अधिकारी थे। उत्तर प्रदेश के आइएएस अफसरों ने एक नवाचार की शुरुआत की थी- खुद आइएएस अफसरों द्वारा मतदान के जरिए भ्रष्ट आइएएस अफसरों का चयन करना। यह हर साल होता था। लाली को इसके अंतर्गत चयनित होने का गौरव मिल चुका था। मजेदार बात यह है कि इसके बावजूद उनके रिटायरमेंट के बाद उन्हें प्रसार भारती जैसे महत्वपूर्ण संस्थान में 2006 में सीईओ बनाया गया। प्रसार भारती के नियमों के अनुसार लाली का कार्यकाल 62 वर्ष की आयु पूरी होने पर 2008 में खत्म होना था। सरकार द्वारा नियमों को बदला गया और उन्हें तीन साल की मोहलत दे दी गई। यह सब तब हुआ, जब सेंट्रल विजिलेंस कमीशन उन्हें पहले ही भ्रष्टाचार के मामलों में चिह्नित कर चुका था। यह एक मामूली सा प्रसंग है, लेकिन इस कहानी के पीछे जो निहित स्वार्थ काम कर रहे हैं, वे कतई मामूली नहीं हैं। सरकार बार-बार प्रशासनिक व्यवस्था में सुधार की बात करती है। कुछ माह पहले ही द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग ने इसके लिए अपनी रिपोर्ट भी सरकार को सौंप दी है। बीच-बीच में भी अनेक छोटे-मोटे आयोग बैठाए गए, ताकि भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था को ऐसा बनाया जा सके, जो परिणामोन्मुख हो, पारदर्शी हो तथा जवाबदेह हो। इसी को ध्यान में रखते हुए संघ लोकसेवा आयोग ने कुछ माह पहले प्रशासनिक अधिकारियों की भर्ती प्रणाली में परिवर्तन की घोषणा की थी। यहां सवाल यह है कि प्रशासनिक व्यवस्था में हम जिस तरह के सकारात्मक परिवर्तन की उम्मीद कर रहे हैं, क्या वह इस तरह के कॉस्मेटिक परिवर्तन से पूरी हो सकेगी? इस प्रश्न का जवाब लाली की कहानी से मिल जाता है। वस्तुत: जब भी प्रशासनिक व्यवस्था की बात आती है, तो उसका ठीकरा प्रशासनिक अधिकारियों के सिर फोड़ा जाता है। उनकी योग्यता और निष्ठा पर उंगली उठाई जाती है। बाद में जब कोई घोटाला सामने आता है तो यह कहकर उन्हें इसका शिकार बनाया जाता है कि व्यवस्था ने कार्यप्रणाली का पालन ठीक तरह से नहीं किया। दारुण स्थिति यह है कि इस संबंध में प्रशासनिक व्यवस्था को चलाने वाले राजनीतिक आकाओं के हाथ में निहित शक्ति के दुरुपयोग की पूरी तरह अनदेखी कर दी जाती है। इस बात पर पूरे देश में गंभीर बहस और विचार-मंथन किया जाना चाहिए कि राजनीति और प्रशासन के बीच किस तरह के संबंध हों। भले ही प्रशासनिक कार्यपालिका स्थायी और राजनीतिक कार्यपालिका अस्थायी है, लेकिन इस अस्थायी शक्ति के सामने स्थायी शक्ति लाचार है। यह कोई नई बात नहीं है। मध्य प्रदेश कैडर के एक आइएएस अफसर थे सुंदरम जी, जो लोकसेवा आयोग के अध्यक्ष भी बने। उन्होंने मुझे बताया था कि सन 1956 में जब उन्हें सरगुजा जिले का कलेक्टर बनाकर भेजा गया, तो उन्होंने चली आ रही परंपरा के अनुसार वहां के राजमहल में जाकर हाजिरी लगाने से मना कर दिया था। एक सप्ताह के अंदर ही उनका तबादला किसी दूसरे जिले में कर दिया गया था। पिछले पंद्रह-बीस वषरें में केंद्र और राज्य सरकारों में सर्वोच्च पदों पर नियुक्त अधिकारियों के पुनस्र्थापन की एक नई प्रवृत्ति उभरी है। किसी को भ्रम नहीं होना चाहिए कि अधिकारियों को जो सेवा विस्तार दिया जाता है, उसका कारण उनकी योग्यता नहीं, राजनेताओं को उपकृत करने का पुरस्कार होता है। अब हमारे सामने दो स्थितियां स्पष्ट हैं। पहली यह कि जो अधिकारी जनता द्वारा स्पष्ट रूप से दागी अधिकारी के रूप में जाने जाते हैं, उनके साथ सरकार का व्यवहार कैसा होता है। यदि सरकार दागी अफसरों उपकृत कर रही है जैसा कि केंद्रीय सतर्कता आयुक्त पद पर नियुक्त पीजे थॉमस के मामले में देखने में आ रहा है, तो स्पष्ट तौर पर इससे पूरे के पूरे प्रशासनिक वर्ग का मनोबल कमजोर होता है। दूसरी स्थिति यह है कि सरकार को ऐसे ही अधिकारी भाते हैं जो मंत्रियों की भाषा में बात करें, न कि ऐसे अधिकारी, जो नियम-कानून और प्रक्रिया का हवाला देकर गलत काम में अड़ंगे लगाएं। यदि यही हालात रहे तो ऊपरी तौर पर किए गए प्रशासनिक सुधार कितने कारगर हो पाएंगे, इसके बारे में संदेह की कोई गुंजाइश नहीं रह जाती। (लेखक पूर्व आइएएस अधिकारी हैं)