कोई भी सरकार हर कसौटी पर खरी नहीं उतर सकती। भारत में स्थायी और जीवंत लोकतंत्र है। जब हम मध्य एशिया की हाल की घटनाओं पर निगाह डालते हैं तो राहत महसूस करते हैं। हमें भारतीय मतदाताओं को सलाम करना चाहिए जिनकी सक्रिय भागीदारी से भारत में लोकतांत्रिक संस्था फल-फूल रही है। हर प्रकार की ज्यादतियों पर वोटों की शक्ति भारी पड़ी है। मिश्च के हालिया विद्रोह में हम दिल से वहां की जनता के साथ हैं, जो लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए संघर्षरत है। पिछले एक पखवाड़े में लोकतंत्र हासिल करने के लिए मिश्च की जनता की एकजुटता और शक्ति देखने को मिली है। मुबारक के काइरो छोड़ जाने के बाद अब अमेरिका का शक्ति प्रदर्शन देखने को मिलेगा। मध्य एशिया में अपने हितों की रक्षा के लिए अमेरिका और यूरोप चाहेंगे कि मिश्च में स्थायी सरकार का गठन हो। एकल अधिसत्ता के अधीन रहे मध्य एशिया के लोगों की अभिलाषा पर हमेशा पाश्चात्य देशों के हित भारी पड़े हैं। मध्य-पूर्व एशिया और उत्तरी अफ्रीका के बहुत से देशों में विद्रोह चल रहा है। इन देशों के हालात बहुत जटिल हैं। इनमें परिवर्तन की बयार लंबे समय तक बाहरी शक्तियों और घरेलू शक्तियों को रास नहीं आएगी। उत्तरी अफ्रीका में मोरक्को, अलजीरिया, ट्यूनीशिया, इथियोपिया, यमन और सोमालिया तथा मध्य-पूर्व एशिया में सऊदी अरब, जॉर्डन, इराक व ईरान के साथ-साथ खाड़ी देशों में कभी भी एकल शासन के खिलाफ विद्रोह का बिगुल बज सकता है। एक ऐसे क्षेत्र में जहां व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हनन होता रहा है, स्वतंत्रता का कीटाणु क्रांति सरीखे हालात पैदा कर सकता है। मध्य एशिया और उत्तरी अफ्रीका के भविष्य के आकलन में इस क्षेत्र का इतिहास महत्वपूर्ण भूमिका अदा करेगा। इन क्षेत्रों के बहुत से भाग औपनिवेशिक दासता से त्रस्त रहे हैं और इन्होंने कभी लोकतांत्रिक हवा में सांस नहीं ली है। पाश्चात्य शक्तियों ने अपने राजनीतिक और व्यावसायिक हितों के लिए इन क्षेत्रों में कठपुतली सरकारों का गठन किया है और यहां के अधिकांश शासकों ने कभी इनके साथ टकराव मोल नहीं लिया है। किंतु यह तिकड़म हमेशा के लिए काम नहीं करती, जैसाकि हमने हाल ही में मिश्च, इराक और ईरान में देखा है। इन देशों में जनता ने शासकों के खिलाफ विद्रोह किया है या शासकों को बदलने के अभियान में शामिल रही है। मध्य एशिया के सामरिक महत्व को देखते हुए विश्व की तमाम शक्तियों ने यहां अपना प्रभाव बढ़ाने का पुरजोर प्रयास किया है। 1980-88 के दौरान इराक-ईरान के बीच भीषण युद्ध में करीब छह लाख लोग मारे गए और इतने ही घायल हुए। इस युद्ध में अमेरिका और सोवियत संघ दोनों महाशक्तियों ने सद्दाम हुसैन के नेतृत्व वाले इराक का समर्थन किया था किंतु बाद में सोवियत संघ ने अफगानिस्तान में निरपेक्षता के बदले में ईरान का समर्थन शुरू कर दिया था। अमेरिका ने भी निकारगुआ और कुछ हद तक लेबनान में कम्युनिस्ट विरोधी शक्तियों को ईरान के माध्यम से सहायता पहुंचाई थी। तब से हालात काफी बदल चुके हैं। अमेरिका के दखल से मिश्च-इजराइल संधि हुई। वहां राष्ट्रपति अनवर सद्दात की हत्या के बाद होस्नी मुबारक ने सत्ता संभाली। वह तीन दशक से अमेरिका के प्रबल समर्थक रहे हैं। फिर अचानक ट्यूनीशिया में विद्रोह भड़क उठा और आंदोलन काइरो की गलियों तक पहुंच गया। जब हम परिवर्तन की बात करते हैं तो सूचना प्रौद्योगिकी की भूमिका की अनदेखी नहीं कर सकते। सोशल नेटवर्किग ने दुनिया को एक कंप्यूटर में समाहित कर दिया है। हम इंटरनेट की इस ताकत को मिश्च में भी देख चुके हैं, जब होस्नी मुबारक की तमाम तिकड़में इंटरनेट के माध्यम से एकजुट हुए लोगों की शक्ति के सामने धरी की धरी रह गईं। पूरी दुनिया ने देखा कि मिश्च में हाथों में नंगी तलवार लिए गुंडों ने ऊंटों और घोड़ों पर सवार होकर किस तरह शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे निहत्थे लोगों पर कहर बरपाया। दिल दहलाने वाला वह दृश्य भी लोगों की आंखों के सामने घूम रहा है जब अमेरिकी दूतावास से वैन चुराकर गुंडों ने काइरों की सड़कों पर कई लोगों को कुचल डाला। कुछ ही मिनटों में होस्नी मुबारक की अधिसत्ता और मिश्च की सेना के खिलाफ पूरी दुनिया में असंतोष भड़क उठा। जनाक्रोश के सामने मिश्च की खुफिया पुलिस और सेना बेअसर रहीं। मिश्च की सड़कों पर उठे तूफान की पल-पल की खबरें मोबाइल फोन, फेसबुक, यूट्यूब और ट्विटर के माध्यम से पूरी दुनिया के लोगों तक पहुंच रही थीं। इंटरनेट की इस शक्ति ने हमारे सोचने-समझने के तरीके को बदल दिया है। इससे निश्चित तौर पर सरकारें भी अपनी कार्यप्रणाली में सुधार लाएंगी ताकि काइरो की तरह सड़कों पर भय का शासन न रहे। (लेखक पूर्व केंद्रीय मंत्री हैं)
Showing posts with label १२ फरवरी. Show all posts
Showing posts with label १२ फरवरी. Show all posts
Saturday, February 12, 2011
पश्चिम बंगाल में कैसे बढ़े मतदान, कम हो हिंसा
हिंसा और खास तौर पर पैसों के दुरुपयोग को लेकर बिहार में आजमाए गए सफल नुस्खों से उत्साहित चुनाव आयोग की नजर अब पश्चिम बंगाल पर है। लगातार राज्य का जायजा ले रहे आयोग में विशेष तौर पर उन कवायदों पर चर्चा हो रही है जिनसे न सिर्फ हिंसा कम हो बल्कि मतदान प्रतिशत भी बढ़े। माना जा रहा है कि जागरूकता के साथ-साथ चुनाव छह चरणों में करवाए जा सकते हैं। मार्च के पूर्वार्द्ध में इसका एलान संभव है। जबकि खर्च पर लगाम कसने के लिए सीबीडीटी (केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड) के साथ बैठक हो चुकी है। पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल, पुड्डूचेरी और असम में होने वाले विधानसभा चुनाव पर भी बिहार का असर होगा। दरअसल बिहार में आयोग ने कुछ नए नुस्खे आजमाए थे। इनमें सबसे महत्वपूर्ण नुस्खा चुनावी खर्च के लिए एक बैंक खाते का था। आयोग का मानना था कि इससे चुनाव के सभी क्षेत्रों पर असर हुआ था। पांच राज्यों में इसकी गहन परख होगी। पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु नजरों में सबसे ऊपर है। गौरतलब है कि इन दोनों राज्यों में हिंसा और पैसों के दुरुपयोग का रिकार्ड रहा है। पश्चिम बंगाल में राजनीतिक हिंसा के साथ नक्सलवाद से भी आयोग चिंतित है। सूत्रों का मानना है कि ऐसी स्थिति में चुनाव लंबा खिंच सकता है। पिछली बार पांच चरणों में चुनाव हुए थे। माना जा रहा है कि इस बार यह छह चरणों तक जा सकता है ताकि पर्याप्त सुरक्षा व्यवस्था हो सके। मतदान की तारीखें अप्रैल से मई तक खिंचेंगी। दूसरी तरफ चुनावी खर्च पर लगाम कसेगी। हाल ही में आयोग ने सीबीडीटी के साथ बैठक कर इसकी चर्चा की। एयरपोर्ट, रेलवे स्टेशन, होटल, हवाला लेनदेन जैसे स्थानों व चीजों पर विशेष नजर रखने का निर्देश दिया गया है। जबकि राजनीतिक दलों के खातों पर सूक्ष्म नजर रखने के लिए चार्टर्ड एकाउंटेंट के साथ भी बैठक हुई। चुनावी खर्च के लिए एक खाता का प्रावधान भी लागू होगा। यानी उम्मीदवारों को एक ही खाते से सभी खर्च करने का निर्देश दिया जाएगा ताकि उनके साथ साथ तालमेल रखने वालों पर भी नजर रखी जा सके।
Subscribe to:
Posts (Atom)