कोटद्वार उत्तराखंड के कोटद्वार शहर को बसाने वाली बोक्सा जनजाति खुद बेघर होने की कगार पर है। अशिक्षा और मांस-मदिरा (शराब) के शौक ने जनजाति को समाप्ति के कगार पर ला दिया है। आज भले ही कोटद्वार उत्तराखंड के बड़े शहरों की फेहरिस्त में शामिल हो, लेकिन एक समय ऐसा भी था जब कोटद्वार को कालापानी की संज्ञा दी जाती थी। पूरे क्षेत्र में मलेरिया व हैजा का प्रकोप था। 17-वीं सदी के अंत में बोक्सा जनजाति ने कोटद्वार में बसागत शुरू की और विपरीत परिस्थितियों से लड़ते हुए स्वयं को न सिर्फ माहौल के काबिल बनाया, बल्कि यहां खेती भी शुरू कर दी। अंग्रेजों ने बोक्सा जाति की माली हालत के मद्देनजर उन्हें भूमि दी, लेकिन 1960 में हुए बंदोबस्त में इनकी जमीन पर अन्य लोगों ने कब्जा जमा दिया। आज हालात यह हैं कि बोक्सा जनजाति के परिवार हल्दूखाता, लूथापुर, लछमपुर व तल्ला मोटाढाक क्षेत्र में सिमट गए हैं और उनकी कुल आबादी पांच सौ के आसपास है। यूं तो कानूनन बोक्साओं की भूमि की खरीद-फरोख्त पर सरकार ने रोक लगा रखी थी, बावजूद इसके क्षेत्र में प्रापर्टी डीलर इनकी भूमि को विभिन्न प्रपंचों से लगातार बेच रहे हैं। बोक्साओं के गांवों में प्राथमिक विद्यालय तो हैं, लेकिन जागरूकता के अभाव में इनके बच्चे विद्यालयों का रुख कम ही करते हैं। साठ फीसदी बच्चों ने कभी स्कूल का मुंह देखा ही नहीं हैं। महज एक- दो फीसदी बच्चे ही महाविद्यालय का मुंह देख पाते हैं। बच्चों को शिक्षित करने के नाम पर कई संगठन सरकारी धन को हड़प रहे हैं, लेकिन नतीजा सिफर है। इनके गांवों में अलग से सरकारी चिकित्सालय की कोई व्यवस्था नहीं है। बोक्साओं का इतिहास : बोक्साओं को यह नाम अंग्रेजों का दिया हुआ है। बोक्सा जनजाति मूलत: खानाबदोश जाति थी, जो कि जंगलों में जीवन व्यतीत किया करती थी। हिमाचल से रायवाला तक बोक्साओं को मेहर कहा जाता है, जबकि कुमाऊं सीमा से तराई-भाबर में इन्हें बोक्सा व रामनगर से पीलीभीत तक इन्हें थारू कहा जाता है। यह बात और है कि थारू व मेहर की अपेक्षा वर्तमान में बोक्सा ही सर्वाधिक पिछड़े हुए हैं। प्रकृति पर निर्भर यह जनजाति मांस-मदिरा की बेहद शौकीन होती है व आज यही शौक इनकी बदनसीबी बन गया है। अनोखी वैवाहिक परंपरा : बोक्सा जाति की वैवाहिक परंपरा बेहद अनोखी है। यहां विवाह से पूर्व वर को वधू पक्ष को इस बात से संतुष्ट करना होता है कि वह हर हाल में वधू का भरण-पोषण कर सकता है। इसके लिए वर को विवाह से पूर्व एक माह तक मंगेतर के घर पर रहना पड़ता है, जहां वह न सिर्फ झोपड़ी बनाता है बल्कि उससे खेती सहित अन्य तमाम कार्य लिए जाते हैं। इस परीक्षा में फेल होने पर उसे विवाह के योग्य नहीं माना जाता। आज भी कायम है नमक-लोटा : बोक्सा जनजाति में नमक-लोटा परंपरा है, जिसके तहत भरी पंचायत के मध्य में पानी से भरा लोटा रख दिया जाता है व बोक्सा जाति के लोग इस पानी से भरे लोटे में एक-एक चुटकी नमक डाल शपथ लेते हैं। उनका मानना है कि यदि वे शपथ पूर्ण नहीं करेंगे तो उनका शरीर पानी में नमक के समान घुल जाएगा। राजनीतिक दल बोक्सा जाति को लालच दे अपने पक्ष में नमक-लोटा करवा देते हैं व चुनाव के बाद उनकी सुध लेने की जहमत नहीं उठाते।
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Wednesday, January 26, 2011
अस्तित्व के संकट से जूझती बोक्सा जनजाति
कोटद्वार उत्तराखंड के कोटद्वार शहर को बसाने वाली बोक्सा जनजाति खुद बेघर होने की कगार पर है। अशिक्षा और मांस-मदिरा (शराब) के शौक ने जनजाति को समाप्ति के कगार पर ला दिया है। आज भले ही कोटद्वार उत्तराखंड के बड़े शहरों की फेहरिस्त में शामिल हो, लेकिन एक समय ऐसा भी था जब कोटद्वार को कालापानी की संज्ञा दी जाती थी। पूरे क्षेत्र में मलेरिया व हैजा का प्रकोप था। 17-वीं सदी के अंत में बोक्सा जनजाति ने कोटद्वार में बसागत शुरू की और विपरीत परिस्थितियों से लड़ते हुए स्वयं को न सिर्फ माहौल के काबिल बनाया, बल्कि यहां खेती भी शुरू कर दी। अंग्रेजों ने बोक्सा जाति की माली हालत के मद्देनजर उन्हें भूमि दी, लेकिन 1960 में हुए बंदोबस्त में इनकी जमीन पर अन्य लोगों ने कब्जा जमा दिया। आज हालात यह हैं कि बोक्सा जनजाति के परिवार हल्दूखाता, लूथापुर, लछमपुर व तल्ला मोटाढाक क्षेत्र में सिमट गए हैं और उनकी कुल आबादी पांच सौ के आसपास है। यूं तो कानूनन बोक्साओं की भूमि की खरीद-फरोख्त पर सरकार ने रोक लगा रखी थी, बावजूद इसके क्षेत्र में प्रापर्टी डीलर इनकी भूमि को विभिन्न प्रपंचों से लगातार बेच रहे हैं। बोक्साओं के गांवों में प्राथमिक विद्यालय तो हैं, लेकिन जागरूकता के अभाव में इनके बच्चे विद्यालयों का रुख कम ही करते हैं। साठ फीसदी बच्चों ने कभी स्कूल का मुंह देखा ही नहीं हैं। महज एक- दो फीसदी बच्चे ही महाविद्यालय का मुंह देख पाते हैं। बच्चों को शिक्षित करने के नाम पर कई संगठन सरकारी धन को हड़प रहे हैं, लेकिन नतीजा सिफर है। इनके गांवों में अलग से सरकारी चिकित्सालय की कोई व्यवस्था नहीं है। बोक्साओं का इतिहास : बोक्साओं को यह नाम अंग्रेजों का दिया हुआ है। बोक्सा जनजाति मूलत: खानाबदोश जाति थी, जो कि जंगलों में जीवन व्यतीत किया करती थी। हिमाचल से रायवाला तक बोक्साओं को मेहर कहा जाता है, जबकि कुमाऊं सीमा से तराई-भाबर में इन्हें बोक्सा व रामनगर से पीलीभीत तक इन्हें थारू कहा जाता है। यह बात और है कि थारू व मेहर की अपेक्षा वर्तमान में बोक्सा ही सर्वाधिक पिछड़े हुए हैं। प्रकृति पर निर्भर यह जनजाति मांस-मदिरा की बेहद शौकीन होती है व आज यही शौक इनकी बदनसीबी बन गया है। अनोखी वैवाहिक परंपरा : बोक्सा जाति की वैवाहिक परंपरा बेहद अनोखी है। यहां विवाह से पूर्व वर को वधू पक्ष को इस बात से संतुष्ट करना होता है कि वह हर हाल में वधू का भरण-पोषण कर सकता है। इसके लिए वर को विवाह से पूर्व एक माह तक मंगेतर के घर पर रहना पड़ता है, जहां वह न सिर्फ झोपड़ी बनाता है बल्कि उससे खेती सहित अन्य तमाम कार्य लिए जाते हैं। इस परीक्षा में फेल होने पर उसे विवाह के योग्य नहीं माना जाता। आज भी कायम है नमक-लोटा : बोक्सा जनजाति में नमक-लोटा परंपरा है, जिसके तहत भरी पंचायत के मध्य में पानी से भरा लोटा रख दिया जाता है व बोक्सा जाति के लोग इस पानी से भरे लोटे में एक-एक चुटकी नमक डाल शपथ लेते हैं। उनका मानना है कि यदि वे शपथ पूर्ण नहीं करेंगे तो उनका शरीर पानी में नमक के समान घुल जाएगा। राजनीतिक दल बोक्सा जाति को लालच दे अपने पक्ष में नमक-लोटा करवा देते हैं व चुनाव के बाद उनकी सुध लेने की जहमत नहीं उठाते।
Thursday, January 13, 2011
तीन साल में 28 गांवों में पहुंची बिजली
झारखंड के चतरा जिले में राजीव गांधी ग्रामीण विद्युतीकरण योजना के तहत 1037 गांवों को विद्युतीकृत किया जाना था। शासन ने इस काम के लिए कार्यदाई संस्था को भरपूर समय दिया। दो-दो बार काम की समयवाधि बढ़ाई। इसके बाद भी महज 28 गांव रोशन हुए। यानी तीन वर्षो में करीब ढाई फीसदी काम हुआ। जिले के 1009 गांवों के लोगों के लिए बिजली अब भी सपना है। चतरा जिले में ग्रामीण विद्युतीकरण की यह रिपोर्ट विकास योजनाओं को मुंह चिढ़ाने का जीता जागता उदाहरण हैं। विद्युत विभाग के कार्यपालक अभियंता इंद्रदेव चौधरी का कहना है कि तीन वर्ष पूर्व हुए एकरारनामा के मुताबिक दामोदर वैली कारपोरेशन (डीवीसी) को मार्च 2010 तक सभी विद्युतविहीन राजस्व गांवों का विद्युतीकरण कर देना था। निर्धारित समय में काम पूरा न होने के कारण कार्यदाई संस्था को छह महीने का अवधि विस्तार किया गया, लेकिन उसके बाद भी विद्युतीकरण का कार्य में तेजी नहीं आई। हालात को देखते हुए एक बार फिर छह महीने का अतिरिक्त समय दिया गया। मगर स्थिति जस की तस बनी हुई है। उन्होंने बताया कि अभी तक डीवीसी ने जिले के 283 गांवों में खंभा और तार लगा दिया है। 600 गांवों में कार्य प्रगति पर है। जिले में राजस्व वाले गांवों की संख्या 1341 है। इसमें से 304 गांव पूर्व से ही विद्युतीकृत है। शेष विद्युतविहीन गांवों को विद्युतीकरण करने का ठेका डीवीसी को दिया गया है। वर्तमान स्थिति को देखते हुए यह समझ पाना मुश्किल है कि आखिर विद्युतविहीन गांवों में बिजली कब तक पहुंचेगी।
छह विद्युत सब स्टेशन निर्माण अधर में :
डीवीसी को जिले में छह विद्युत सब स्टेशन का निर्माण भी करना है। इसके लिए उसे 2010 तक का समय दिया गया था। अभी तक एक भी सब स्टेशन का निर्माण पूरा नहीं हो सका है। ऐसे में अगर भविष्य में गांवों में बिजली पहुंच भी जाए लेकिन उन्हें रोशन करना शायद संभव न होगा।
वन कानून आ रहा आड़े :
वन विभाग के रोड़े के कारण भी 200 गांवों में विद्युतीकरण का काम लटका हुआ है। जब तक वन विभाग से अनापत्ति प्रमाण पत्र नहीं मिलता है, तब तक लगभग 200 गांवों को विद्युतीकृत नहीं किया जा सकता है।
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