Thursday, March 29, 2012

दूर होता दहाई विकास का सपना


एक ऐसे समय में जबकि वैश्विक आर्थिक मंदी के बीच सरकार की साख दिनोंदिन गिर रही है, बढ़ती कीमतों और राजस्व घाटे के बीच ऐसा बजट प्रस्तुत करना जो सबको खुश कर सके और विकास की दर भी बढ़ाए, तलवार की धार पर चलने के समान है। सात वर्षो से लगातार बजट पेश करते आ रहे वित्तमंत्री प्रणब मुखर्जी ने इस वर्ष के बजट में जो प्रावधान किए हैं वे उम्मीदों पर खरे नहीं उतरते। न तो महंगाई पर लगाम कसने के लिए ठोस कदम सुझाए गए और न ही आर्थिक विकास को दिशा दी गई है। प्रत्यक्ष कर में मात्र दो हजार रुपये की छूट आंसू पोंछने का प्रयास भर है, हालांकि अप्रत्यक्ष करों में वृद्धि इस छोटे से लाभ को भी निरस्त कर देती है। इसी तरह सेवा कर और उत्पाद शुल्क में वृद्धि आम आदमी की आर्थिक तंगी और बढ़ाने वाली है। 7.6 के विकास दर का लक्ष्य और राजस्व घाटे को 5.1 पर सीमित करने का वायदा भी वित्तमंत्री पूरा कर सकेंगे, इसमें संदेह है। पिछले वर्ष विकास की दर अपेक्षा से कम रही और राजस्व घाटा अनुमान से अधिक। महंगाई की दर में थोड़ी सी कमी आई है, लेकिन आने वाले दिनों में कीमतों में फिर उछाल आने की संभावना है, क्योंकि पेट्रोल की कीमतें बढ़ने वाली हैं और उत्पाद शुल्क की बढ़ोतरी आग में घी का काम करेगी। उत्पाद करों में वृद्धि से कच्चे माल की कीमतों और किराए भाड़े में वृद्धि होगी जिससे वस्तुओं की कीमतें बढ़ेंगी और मांग घटेगी। छोटे उद्योगों के लिए इंडिया अपार्चुनिटी वेंचर फंड की स्थापना स्वागतयोग्य है, लेकिन इन उद्योगों को चीन से आयातित सस्ती चीजों से जो खतरा है। इस संदर्भ में ध्यान देना जरूरी नहीं समझा गया। बड़े पैमाने पर रोजगार देने वाले छोटे उद्योग बंद हो रहे हैं। बिजली की कमी, कच्चे माल की बढ़ती कीमतें, आधुनिक तकनीक के लिए धन का अभाव एक बड़ी बाधा है। हथकरघा उद्योग और बुनकरों पर ध्यान दिया गया है, लेकिन अन्य लघु उद्योगों में कार्यरत असंगठित कामगारों की भलाई के लिए कोई योजना सरकार की ओर से आखिर क्यों नहीं आती? कृषि में हरित क्रांति के लिए अनुसंधान पर खर्च बढ़ाने का प्रावधान अच्छा कदम है। पूर्वोत्तर राज्यों में धान की रिकॉर्ड पैदावार से साबित होता है कि उन्नत बीजों, कृषि संसाधनों और शिक्षा पर खर्च खाद्यान्न में आत्मनिर्भरता के लिए जरूरी है। मनरेगा के लिए बजट राशि इस बार घटाई गई है जिससे सरकार की मंशा पर सवाल खड़े होते हैं। जहां तक खेती की बात है तो विकसित राज्यों की उपेक्षा की गई है और भूमि अधिग्रहण नीति पर सरकार मौन है। ग्रामीण सड़कों के लिए निर्धारित राशि आवश्यकता से काफी कम है। इसी तरह जलवायु परिवर्तन की समस्या से निपटने के लिए भी कारगर उपाय नहीं सुझाए गए हैं। आज भी लाखों गांवों में बिजली, सड़क, पीने का स्वच्छ पानी और प्राथमिक पाठशालाओं का अभाव दर्शाता है कि सरकार की कथनी और करनी में कितना अंतर है। खुदरा व्यापार में विदेशी कंपनियों की मौजूदगी बढ़ाने की सरकार की मंशा चिंताजनक है। इसका रोजगार पर बुरा असर पड़ेगा। बड़े-बड़े शहरों में कुछ मॉल खुल जाएं तो उनसे देश का खुदरा व्यापार अधिक प्रभावित नहीं होता, किंतु जब अंतरराष्ट्रीय कंपनियों को पूरे देश में पैर पसारने की सुविधा मिल जाएगी तो छोटे खुदरा व्यापारी कहीं के नहीं रहेंगे। मल्टी ब्रांड में विदेशी कंपनियों की भागीदारी में जल्दबाजी देशहित में नहीं होगी। यूरोप एवं अमेरिका की आबादी बहुत कम है, वहां मॉल सभ्यता लाभप्रद है किंतु भारत जैसे सघन और बड़ी आबादी वाले देश में रोजगार के अवसर बढ़ाने वाले कदम उठाने चाहिए न कि सीमित करने के। काले धन पर श्वेतपत्र लाने का वायदा सरकार ने किया है। कुछ लोगों ने विदेशों में इतनी संपत्ति जमा की है जो हमारी सकल घरेलू उत्पाद की लगभग एक तिहाई है, लेकिन ऐसे लोगों के नामों की घोषणा पर सरकार चुप है। जनआंदोलन के दबाव में जो लोकपाल बिल संसद में आया उस बारे में भी कोई घोषणा नहीं की गई। बजट में एक महत्वपूर्ण घोषणा विदेशी कंपनियों द्वारा देश के अंदर खरीदी गई संपत्ति के संबंध में है। विदेशी कंपनियां अब भारत में खरीदी गई संपत्ति पर टैक्स नहीं बचा पाएंगी। इसी तरह सोने पर आयात कर बढ़ने से सोने के बाट और सिक्के महंगे हो जाएंगे जिसका असर सोने के आभूषणों के निर्यात पर पड़ेगा और इससे कालाबाजारी भी बढ़ेगी। अर्थव्यवस्था की धुरी है बचत। हमारी बचत की प्रवृत्ति ने ही हमें विश्वव्यापी आर्थिक मंदी में बचाए रखा, लेकिन अब यह आधार भी खिसक रहा है, क्योंकि पिछले कुछ वर्षो से बचत दर घट रही है। इस वर्ष के बजट में नए निवेशकों के लिए टैक्स में कुछ छूट के प्रावधान किए गए हैं। राजीव गांधी इक्विटी बचत योजना में 50,000 रुपये तक के निवेश पर उन लोगों को कर छूट मिलेगी जिनकी आमदनी 10 लाख रुपये से कम है, लेकिन शर्त रख दी गई है कि कम से कम तीन साल के लिए इसमें निवेश करना होगा। इसके अलावा बचत खातों पर 10 हजार रुपये तक का ब्याज भी कर मुक्त होगा जिसका लाभ 5 लाख रुपये से कम आमदनी वालों को ही होगा। कुछ डूबते हुए उद्योगों को सरकार ने सहारा दिया है। एयरलाइंस क्षेत्र में विदेशी कंपनियां 49 प्रतिशत तक भागीदारी कर सकती हैं। सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की पूंजी बढ़ाने के लिए बड़े अनुदान की घोषणा हुई है। कुल मिलाकर यह एक मिश्रित प्रभाव वाला बजट है। दहाई विकास का सपना अभी दूर की कौड़ी है और बजट आने के बाद महंगाई और बढ़ने के पूरे आसार हैं। बजट से आम आदमी और व्यापारियों दोनों को निराशा हुई है। (लेखक दिल्ली विवि में व्यावसायिक अर्थशास्त्र विभाग के पूर्व अध्यक्ष एवं डीन हैं) 12श्चश्रल्ल2@Aंॠ1ंल्ल.Yश्रे

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