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Monday, January 10, 2011

सरकार के हाथ का खिलौना है सीबीआइ

लेखक एक जांच एजेंसी के रूप में सीबीआइ की विफलता से जुड़े मुद्दों पर जागरण के सवालों के जवाब दे रहे हैं …

क्वात्रोची से लेकर आरुषि तक सीबीआइ की क्लोजर रिपोर्टे एक जांच एजेंसी के रूप में उसकी विफलता की सबूत हैं। विकल्प के अभाव में सीबीआइ जांच की मांगें भले ही अब भी की जाती हैं, लेकिन सच्चाई यही है कि सीबीआइ से आम आदमी का भरोसा डिगने लगा है। सीबीआइ की विफलता से जुड़े मुद्दों पर इसके पूर्व निदेशक जोगिंदर सिंह से दैनिक जागरण के विशेष संवाददाता नीलू रंजन ने बातचीत की। पेश हैं प्रमुख अंश-
आपको लगता है कि देश की सबसे बड़ी जांच एजेंसी के रूप में सीबीआइ विफल साबित हो रही है?
कोई विशेष कानून तो सीबीआइ के लिए है नहीं। एक छोटी सी एजेंसी है, जिसकी कुल स्ट्रेंथ 6000 हजार है। इनमें में हर समय 30 फीसदी पद खाली होते हैं। ऐसा नहीं है कि सीबीआइ निदेशक अपनी मर्जी से किसी को चुन ले। इंस्पेक्टर और डीएसपी जो जांच अधिकारी के रूप में काम करते हैं उनकी संख्या लगभग 900 है और 300 प्रासीक्यूटर हैं। तीस फीसदी खाली पद के बाद यह संख्या 800 रह जाती है। आदमी कम हैं, दबाव ज्यादा है। फिर भी मैं यह मानता हूं कि कुछ मामलों में सीबीआइ की साख पर धब्बा लगा है।
आरुषि मामले में क्लोजर रिपोर्ट सीबीआइ की साख पर धब्बा नहीं है?
क्लोजर रिपोर्ट में राजेश तलवार पर शक जताकर सीबीआइ ने विवाद खड़ा कर दिया है। आधा-अधूरा आरोप नहीं हो सकता है। या तो आरोपपत्र दाखिल हो या न हो। चाहे जो भी सबूत मिलें। लोगों को सीबीआइ से उम्मीद थी।
फिर क्लोजर रिपोर्ट लगाने का क्या कारण हो सकता है?
मैंने सीबीआई के दस्तावेज देखे नहीं हैं, लेकिन सीबीआइ सीधा कह देती कि हमें केस 15 दिन बाद मिला और तब तक सारे सबूत मिट चुके थे। पांच नंबर के गोल्फ क्लब की कहानी या जांच को प्रभावित करने की कोशिश का आरोप लगाना, जांच का तरीका नहीं है। सीबीआइ में कुछ मामलों की जांच तीन दशक से चल रही है और अब तक केस बंद नहीं किया गया। फिर आरुषि में क्या जल्दी थी।
आरुषि केस में सीबीआई की जांच का स्तर सामान्य पुलिस से भी नीचे का रहा?
ऐसी बात नहीं है कि उनकी जांच का स्तर नीचे रहा है। उन्होंने भरसक प्रयास किया। नहीं मिला, तो नहीं मिला। सीबीआइ के पास कोई जादू की छड़ी तो है नहीं।
सीबीआई ने बोफोर्स मामले में क्वात्रोची के खिलाफ भी क्लोजर रिपोर्ट लगाई है, जबकि आप ही स्विट्जरलैंड से सारे सबूत लाए थे?
हमारे देश के कानून पूरी तरह से औचित्यहीन हो गए हैं। महंगे-महंगे वकील कॉमा, फुलस्टॉप जैसी गलतियां निकालकर अदालत को रास्ते से भटकाने में सफल हो जाते हैं। बोफोर्स मामले को खत्म करने की कोशिश शुरू से होती रही है। हाईकोर्ट ने तो तकनीकी आधार पर 1992 में ही एफआइआर खारिज कर दी थी। बाद में 1994 में जांच फिर से शुरू हो पाई। 2000 में सीबीआइ ने चार्जशीट दाखिल कर दी, लेकिन 2002 में तक केस का ट्रायल शुरू नहीं हो पाया।
आरोपियों का सजा से बच जाना सीबीआइ की विफलता नहीं हुई?
वही तो कह रहा हूं कि कानून की कमजोरियों के सहारे सारे आरोपी बच निकले हैं, न कि सबूतों की कमी के कारण। 2002 में हिंदुजा के वकील ने सीवीसी की मंजूरी नहीं लेने की दलील दी। सीबीआइ को दो साल लग गए सुप्रीमकोर्ट में इसे खत्म कराने में। 2004 में उसी वकील ने हाईकोर्ट में दस्तावेजों की फोटोकापी होने का मुद्दा उठाया, जबकि स्विट्जरलैंड के कानून के मुताबिक वहां की सरकार ने दस्तावेजों की सत्यापित फोटोकापी दी थी। हाईकोर्ट ने इसी आधार पर चार्जशीट ही खारिज कर दी। इसी बीच सरकार बदल गई और उसने सुप्रीम कोर्ट में अपील करने की अनुमति नहीं दी। यानी ट्रायल ही शुरू नहीं हुआ और केस खत्म हो गया।
लेकिन क्वात्रोची को भारत लाने में सीबीआइ पूरी तरह विफल रही?
2007 में सरकार ने एडिशनल सालीसीटर जनरल को लंदन भेजकर क्वात्रोची का पैसा बैंक से यह कहकर रिलीज करा दिया कि उसके खिलाफ सबूत नहीं हैं। वही एएसजी 2004 और 2007 का हवाला देकर क्वात्रोची के खिलाफ केस बंद करने की सलाह देता है। खुद ही वकील और खुद की दलील।
सुप्रीमकोर्ट ने सीबीआई निदेशक को पूरी स्वायत्तता दी, लेकिन किसी ने सरकार का विरोध करने की हिम्मत नहीं दिखाई?
सीबीआइ निदेशकों ने विरोध तो किया है, लेकिन उसे मीडिया को नहीं बता सकते। सीबीआइ को यह अधिकार ही नहीं है। वह सरकार का एक विभाग है और उसे उसके निर्देशों का पालन करना है।
आयकर अपीली न्यायाधिकरण ने बोफोर्स में दलाली की पुष्टि कर दी है। फिर भी सीबीआइ का वकील अदालत में केस बंद करने की दलील दे रहा है?
वह सीबीआइ का नहीं, सरकार का वकील है। कभी एएसजी को मजिस्ट्रेट के सामने पेश होते देखा है, लेकिन इस मामले में ऐसा हो रहा है। तकनीकी रूप से भले ही वह सीबीआइ का वकील हो, लेकिन उस पर अधिकार सरकार का है।
सीबीआइ का वकील अदालत में उसके बताए मुद्दों के विरोध में जा सकता है?
जाते हैं, खूब जाते हैं। जब भी सरकार को रास न आए वे सीबीआइ के खिलाफ चले जाते हैं।
कुल मिलाकर एक जांच एजेंसी के रूप में सीबीआइ विफल है?
सीबीआइ न तो स्वतंत्र है और न ही स्वायत्त। यह विफलता तो सरकार की है। सरकार ने सीबीआइ के हाथ पैर बांधने की पूरी कोशिश की है। दो वर्ग बना दिए गए हैं। संयुक्त सचिव और उससे ऊपर तो छानबीन करने के लिए भी अनुमति चाहिए। सीबीआइ तो क्लर्को और सहायकों के लिए है। बड़े अधिकारियों को सरकार का संरक्षण है।
यानी सीबीआइ से जनता ज्यादा उम्मीद नहीं करे?
सीबीआइ में काम करने वाले बहुत बढि़या लोग हैं, लेकिन सरकार के अतिरिक्त रुचि लेने पर मामला बिगड़ जाता है।
सीबीआइ सरकार का औजार बनकर रह गई है?
औजार नहीं, सीबीआइ सरकार का हिस्सा है।
सीबीआई पर आम लोग कैसे भरोसा करें?
यह तो आम आदमी पर निर्भर करता है। आज भी उसका भरोसा कम नहीं हुआ है। अब भी सीबीआइ जांच की मांग होती है।
सेवानिवृत्ति के बाद पद के लालच में सीबीआई निदेशक सरकार की हां में हां मिलाते हैं?
सरकार यह कानून बना दे कि किसी भी अधिकारी को सेवानिवृत्ति के बाद नियुक्ति नहीं दी जाएगी। प्रलोभन तो होता ही है।