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Friday, April 15, 2011

अभियान की नहीं आन्दोलन की आवश्यकता

अभी अन्ना हजारे का जो समूह है, उसे यह पता नहीं है कि कोई आंदोलन करना है तो उसका लक्ष्य क्या होगा। इस अभियान के आगे बढ़ने और आंदोलन बनने की पूरी गुंजाइश है, लेकिन इसके लिए जो पृष्ठभूमि है, या तो उसकी अनदेखी की जा रही है या फिर उसे दबाने की कोशिश हो रही है। मात्र लोकपाल विधेयक से या उसके कानून बन जाने से कुछ ज्यादा हासिल नहीं होगा..
अभी अन्ना हजारे का जो समूह है, उसे यह पता नहीं है कि कोई आंदोलन करना है तो उसका लक्ष्य क्या होगा। इस अभियान के आगे बढ़ने और आंदोलन बनने की पूरी गुंजाइश है, लेकिन इसके लिए जो पृष्ठभूमि है, या तो उसकी अनदेखी की जा रही है या फिर उसे दबाने की कोशिश हो रही है। मात्र लोकपाल विधेयक से या उसके कानून बन जाने से कुछ ज्यादा हासिल नहीं होगा..ह नहीं भूलना चाहिए कि यह अनिश्चिकालीन अनशन था, आमरण अनशन नहीं। यह एक अभियान था। जो व्यक्ति अनशन पर बैठा हुआ था, वह उसे आंदोलन नहीं कह रहा था। यह तो एक कानून के लिए चला अभियान था। अभियान और आंदोलन में बुनियादी फर्क है। आंदोलन स्थाई महत्व के परिवर्तन के लिए होता है और अभियान होता है तात्कालिक लक्ष्य को पाने के लिए। अन्ना के अनशन का तात्कालिक लक्ष्य था, इसे आंदोलन नहीं समझना चाहिए। काफी पहले से अन्ना हजारे सरकार से यह मांग करते रहे हैं कि लोकपाल विधेयक व्यापक बने। इसी साल 7 मार्च को अन्ना हजारे और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की भेंट हुई थी, वह भेंट दो हिस्सों मे हुई। अन्ना हजारे और मनमोहन सिंह की अलग हुई और उसके बाद अन्ना हजारे के साथ जो लोग गए थे, उनके साथ संयुक्त भेंट हुई। उस भेंट में प्रधानमंत्री का रुख नकारात्मक था, वह कह रहे थे कि सुझाव दे दीजिए, हम सुझाव को मंत्रियों के समूह को दे देंगे। बात बनी नहीं। इसके बाद ही अन्ना हजारे ने महाराष्ट्र में गांव-गांव में सभाएं शुरू की। दिल्ली में भी अरविंद केजरीवाल व किरण बेदी की जो टीम है, वह सक्रिय हुई। उसने वातावरण बनाना शुरू किया। फिर अंतत: दिल्ली में अनशन शुरू हुआ।

जो हुआ, उसके तीन पक्ष हैं- एक बुजुर्ग आदमी अनिश्चितकालीन अनशन पर बैठा है, जिसके प्रति देश की शुभकामनाएं हैं। दूसरा पक्ष, उसके समर्थन में युवा व लोग सामने आए हैं। तीसरा पक्ष, पांच विधानसभाओं के चुनाव हो रहे हंै। केरल, पश्चिम बंगाल में कांग्रेस को कोई ज्यादा संकट नहीं है, लेकिन असम और तमिलनाडु में कांग्रेस को यह कहने की जरूरत थी कि हम भी भ्रष्टाचार के खिलाफ हैं। अन्ना हजारे और उनकी टीम ने ऐसा समय चुना, जिसमें कि सरकार को झुकाया जा सके। यह उनकी दूरदर्शिता है, लेकिन इतने ही मात्र से यह आंदोलन नहीं हो जाता है। अब इसमें कांग्रेस का भी हित है, क्योंकि कांग्रेस यह कह सकती है कि सोनिया गांधी के हस्तक्षेप से जनलोकपाल विधेयक बनाने का फैसला हो गया। लेकिन जो संकेत उभर कर आ रहे हैं, उससे ऐसा लगता है कि जो संयुक्त समिति बनी है, उसमें टकराव होगा। सरकार के नुमाइंदे या मंत्री और जनलोकपाल विधेयक के प्रतिनिधि, दोनों में नजरिए का बहुत बड़ा फर्क है। बात हो रही है, मानसून सत्र में ही विधेयक आ जाएगा, लेकिन इसमें अड़चनें आ सकती हैं।

अच्छी बात यह हुई कि संभावना बन गई है, अब लोकपाल विधेयक बन जाएगा, लेकिन इससे एक बड़ा खतरा भी पैदा हुआ है। इससे जो बड़ी उम्मीद जगी है कि केवल इस कानून के आने मात्र से या केवल लोकपाल नामक संस्था बन जाने से भ्रष्टाचार पर अंकुश लग जाएगा। अगर ऐसा नहीं हुआ तो लोग निराश होंगे और वह निराशा कुंठा में बदलेगी और इस तरह के प्रयासों को धक्का लगेगा। उसी तरह का धक्का लगेगा, जिस तरह 1977 में बनी जनता पार्टी की सरकार के गिरने से लगा था। साफ-सुथरी सरकार देने के वादे के साथ जनता सरकार आई थी। जेपी आंदोलन भ्रष्टाचार के खिलाफ और व्यवस्था में सुधार के लिए ही हुआ था। उसे हम आंदोलन कह सकते हैं। उस दौरान कई छोटे-मोटे आंदोलन चले थे, बिहार आंदोलन से पहले गुजरात आंदोलन हुआ था।

जिस तरह से अन्ना हजारे अनिश्चितकालीन अनशन पर बैठे, उससे थोड़ा भिन्न मोरारजी भाई देसाई 1974-75 में आमरण अनशन पर बैठे थे। उनकी मांग थी कि गुजरात विधानसभा भंग हो। कांग्रेस के नेताओं ने, खासकर मुझे याद है- चंद्रशेखर ने इंदिरा गांधी को समझाया कि अगर मोरारजी भाई को कुछ हो जाएगा तो देश में आग लग जाएगी। इंदिरा गांधी मान गईं और गुजरात विधानसभा भंग करने की घोषणा कर दी। यह एक अभियान था, जो पूरा हुआ। उसी के क्रम में जब जेपी ने बिहार विधानसभा को भंग करने की मांग की तो इंदिरा गांधी अड़ गईं। लेकिन अन्ना का यह अभियान एक के बाद दूसरी विधानसभा को भंग करने का फैसला नहीं है। अब जो फैसला होगा, चुनाव के मैदान में होगा। बड़े आंदोलन में अनेक अभियान तो चलते हैं, लेकिन एक अभियान को बड़े आंदोलन में बदलना, मुझे लगता है, यह बड़ी भारी नासमझी है। यह जरूर है कि इस मांग से जो जन उभार हुआ है, उसमें आंदोलन की संभावनाएं हैं, परंतु शर्त यह है कि अन्ना हजारे और उनके लोग आंदोलन के लिए जरूरी व्यवस्थाएं कर सकें। मुझे ऐसा लगता है कि अन्ना हजारे खुद भी अकेले हैं और उनके आसपास जो जमात है, वह भी व्यक्तियों की है, संगठनों की नहीं। किसी भी प्रकार से भारत जैसे विविधताओं से भरे देश में अगर कोई व्यापक संगठन या बड़ी तैयारी न हो तो कोई आंदोलन नहीं हो सकता।

याद कीजिए, महात्मा गांधी ने 1915-16 के बाद और 1942 तक जो भी आंदोलन किए-चलाए, उन सारे आंदोलनों के लिए वे 10-10 साल तैयारी करते थे। कांग्रेस जैसी पार्टी का जब उन्होंने नेतृत्व संभाला तो उसको अखिल भारतीय स्वरूप दिया। गांधीजी ने सारे देश में कांग्रेस और उसके बाहर के नेताओं व लोगों का समर्थन लेकर जो भी आंदोलन छेड़ा, पूरी तैयारी के साथ छेड़ा। अभी अन्ना हजारे का जो समूह है, उसे यह पता नहीं है कि कोई आंदोलन करना है तो उसका लक्ष्य क्या होगा। इस अभियान के आगे बढ़ने और आंदोलन बनने की पूरी गुंजाइश है, लेकिन इसके लिए जो पृष्ठभूमि है, या तो उसकी अनदेखी की जा रही है या फिर उसे दबाने की कोशिश हो रही है। इस आंदोलन के पक्ष में अभिनेता अनुपम खेर भी आए हैं। उन्होंने सही सवाल उठाया है। मैं भी यह मानता हूं कि मात्र लोकपाल विधेयक से या उसके कानून बन जाने से कुछ ज्यादा हासिल नहीं होगा।