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Thursday, February 3, 2011

चुनाव सुधार की राह


सरकार की नई कवायद में ऐसा कुछ नहीं है, जिससे उम्मीद बने
चुनाव सुधार के लिए बनाई गई समिति को लीक से हटकर कुछ नए उपाय तलाशने होंगे, तभी बात बनेगी।

सरकार ने चुनाव सुधार पर एक और कमेटी बना दी है। इस खबर से न कोई हैरानी होती है, न किसी के मन में डर पैदा होता है और न ही कोई आस बंधती है। लोक और तंत्र के बीच गहराते फासले को कागजी रपटों से पाटने की कवायदें पहले भी हो चुकी हैं। इस नई कवायद में ऐसा कुछ नहीं है, जिससे नया होने की उम्मीद हो। समिति में एक-दो समझदार विधि विशेषज्ञ जरूर हैं, लेकिन चुनावी राजनीति केवल कानूनी सवाल नहीं हैं। समिति में एक भी शख्स ऐसा नहीं, जिसने कभी चुनाव लड़ा हो या जिसे चुनावी राजनीति की समझ हो।
हालांकि चुनाव सुधार पर चर्चा का मिजाज भले न बदला हो, उसका संदर्भ जरूर बदला है। पिछले कुछ वर्षों से देश में लोकतांत्रिक सुधारों के लिए प्रतिबद्ध नागरिकों का एक आंदोलन बन रहा है, जिससे लोकतांत्रिक व्यवस्था में सार्थक बदलाव की गुंजाइश बढ़ी है। इन प्रयासों का सत्ता के शिखर पर भी कुछ असर होता दिखता है। बुराड़ी में कांग्रेस की राष्ट्रीय समिति को संबोधित करते समय सोनिया गांधी ने चुनाव के लिए राजकीय कोष के सुझाव पर अपनी मुहर लगाई थी। पिछले कुछ समय से राहुल गांधी ने युवा कांग्रेस में खुले आंतरिक चुनाव की प्रक्रिया चलाई है। पिछले हफ्ते यह घोषणा भी की गई कि इन संगठनों के शीर्ष पदों के लिए मनोनयन की कांग्रेसी रवायत की जगह खुले चुनाव होंगे। सरकार द्वारा इस समिति के गठन को इसी संदर्भ में देखने की जरूरत है।
हालांकि समिति ने अपने एजेंडे में चुनावों में बढ़ते धन और ताकत का असर, राजनीतिक दलों को मर्यादित करने की जरूरत, चुनाव में राजकीय कोष, चुनावी प्रक्रिया को ज्यादा सुचारू बनाने, चुनावी विवादों का बेहतर निपटारा, दलबदल-विरोधी कानून को बेहतर बनाने आदि सभी जरूरी मुद्दों पर विचार किया है। पिछले दो दशक से चुनावी सुधारों की कवायद इन्हीं मुद्दों के इर्द-गिर्द हो रही है। हालांकि यह समिति सांविधानिक व्यवस्था में बुनियादी बदलाव के किसी प्रस्ताव पर गौर नहीं कर रही, जो एक मायने में ठीक ही है। लेकिन फिलहाल साफ नहीं है कि यह समिति पुराने मुद्दों पर घिसी-पिटी बातों से आगे कैसे बढ़ पाएगी।
चुनाव में पैसे के सवाल को ही लें। हर कोई मानकर चलता है कि राजनीति में काले धन के असर को रोकना असली समस्या है। इसलिए सारा ध्यान काले धन पर पाबंदी लगाने वाले कानूनों पर रहता है। अगर ये कानून असरदार हुए, तो जरूर कुछ फायदा होगा। लेकिन काले धन को रोकना सिर्फ चुनावी कानूनों और चुनाव आयोग के बस की बात नहीं है। पूरी आर्थिक व्यवस्था को बदले बगैर काले धन को रोकना असंभव है।
ऐसे में धन बल का असर कम करने के लिए पहले कदम के तौर पर सभी उम्मीदवारों को जरूरी खर्च उपलब्ध करवाने की जरूरत है। राजनीति में ब्लैक को रोकने से पहले पर्याप्त मात्रा में ह्वाइट का इंतजाम करना जरूरी है। राजकीय कोष से चुनाव खर्च का प्रस्ताव इस दिशा में एक बड़ा कदम हो सकता है। इससे ब्लैक तो रुकेगा नहीं, बल्कि यह संभव है कि काले धन के मालिकों को कुछ और पैसा मिल जाए। लेकिन इसका असल फायदा यह होगा कि जनाधार वाले साधारण कार्यकर्ताओं और नेताओं को अपनी पार्टी से टिकट मिलने की संभावना बढ़ेगी। अगर टिकट न भी मिले, तो थैलीशाहों के बरक्स ईमानदार उम्मीदवारों को चुनाव में उतरने की हिम्मत बढ़ेगी।
चुनाव व्यवस्था में सुधार करने वालों को यह सुनिश्चित करना होगा कि हालात पहले से बदतर न हो जाएं। दलबदल-विरोधी कानून इस लिहाज से एक नजीर बन सकता है। जब यह कानून बना था, तो तमाम सुधारकों ने इसका स्वागत किया था। लेकिन जब इससे थोक का दलबदल नहीं रुका, तो इस कानून को और कड़ा बनाने की मांग चारों तरफ से उठी और ऐसा हो भी गया। नए दलबदल कानून का नतीजा यह हुआ है कि दलों पर हाई कमांड की गिरफ्त मजबूत हो गई है। साथ ही संसद और विधानसभाओं में होने वाली बहसें बेमानी हो गई हैं।
चुनाव में बाहुबलियों का असर कम करने के सद्प्रयास ले-देकर आपराधिक पृष्ठभूमि के उम्मीदवारों पर पाबंदियां लगाने तक सिमट जाते हैं। यानी जिनके खिलाफ मामले दर्ज हैं या आरोपपत्र दाखिल हो चुके हैं, सिर्फ उन्हीं पर पाबंदियां लगती हैं। जबकि हर व्यक्ति जानता है कि स्थानीय दबदबे के चलते दबंगों के खिलाफ मामले दर्ज नहीं होते। दूसरी ओर, ईमानदार कार्यकर्ताओं के खिलाफ झूठे मुकदमों की कमी नहीं है। ऐसे में सिर्फ कानूनी बंदिशों से बाहुबली तो फसेंगे नहीं, बचे-खुचे जमीनी कार्यकर्ताओं का रास्ता और कठिन हो जाएगा।
ताजा एजेंडे को देखकर लगता है कि यह समिति भी अपना समय व्यर्थ के सुझावों पर गौर करने में लगाएगी, जैसे, चुनावों में उम्मीदवारों और पार्टियों की संख्या कैसे घटाई जाए, चुनाव प्रचार पर पाबंदियां कैसे कड़ी की जाएं आदि। दूसरी तरफ, इसने गंभीर विषयों पर विचार करने की इच्छाशक्ति नहीं दिखाई है, मसलन-चुनावों में मीडिया तंत्र के दुरुपयोग पर पाबंदी कैसे लगे, राजनीति में चंद पार्टियों के एकाधिकार को कैसे तोड़ा जाए, कैसे सुनिश्चित किया जाए कि पार्टियां टिकट बांटते समय कार्यकर्ताओं की राय सुनने पर मजबूर हों, चुनावी वायदों के लिए नेताओं और पार्टियों की जवाबदेही कैसे सुनिश्चित की जाए आदि-आदि। इसके बिना लोकतांत्रिक बदलाव की गुंजाइश नहीं बनती। वैसे तो आशा का दामन नहीं छोड़ना चाहिए, लेकिन चुनाव सुधार पर बनी यह समिति जिस रास्ते पर चल रही है, उससे लगता है कि इस कवायद के बाद हम वहीं खड़े रहेंगे, जहां से चले थे।